एनडीए के चक्रव्यूह में घिरे कुशवाहा! बेटे की कुर्सी पर संकट…जानिए कि इसी बीच निशांत कार्ड क्यों खेल रहे उपेंद्र

राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के सियासी तेवर एक बार फिर बिहार के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गए हैं। पटना के रवींद्र भवन में पार्टी के संगठनात्मक चुनाव के मंच से कुशवाहा का दर्द खुलकर बाहर आया। एक तरफ जहां उन्होंने अपने बेटे और बिहार के स्वास्थ्य मंत्री दीपक प्रकाश की एमएलसी सीट फंसने पर बेबसी जताई, वहीं दूसरी तरफ नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को उनका ‘असली उत्तराधिकारी’ बताकर एनडीए गठबंधन के भीतर एक नया सियासी बखेड़ा खड़ा कर दिया है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
कुल मिलाकर, उपेंद्र कुशवाहा इस समय दोतरफा मोर्चे पर लड़ रहे हैं। एक तरफ बेटे की मंत्री पद की साख दांव पर है, जहां वे एनडीए के सामने लाचार नजर आ रहे हैं। दूसरी तरफ, गठबंधन में अपना वजूद बनाए रखने के लिए वे वैचारिक मतभेद और उत्तराधिकारी का नया राग अलाप रहे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा के मजबूत संगठन के सामने कुशवाहा का यह ‘निशांत कार्ड’ उन्हें चक्रव्यूह से बाहर निकाल पाता है या नहीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुशवाहा इस समय भाजपा के रणनीतिक चक्रव्यूह में पूरी तरह घिर चुके हैं और यह बयानबाजी इसी दबाव का नतीजा है।

पुत्र मोह या मजबूरी? मंत्री पद पर गहराया संकट
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर मंडराता खतरा है। वर्तमान में दीपक प्रकाश बिहार सरकार में मंत्री हैं, लेकिन वे राज्य विधानमंडल (विधानसभा या विधान परिषद) के किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत उन्हें 6 महीने के भीतर सदस्यता लेनी अनिवार्य है।
संकट यह है कि एनडीए ने आगामी विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव में दीपक प्रकाश को टिकट नहीं दिया है। यदि वे समय रहते एमएलसी नहीं बनते हैं, तो उन्हें मंत्री की कुर्सी छोड़नी होगी। मंच से कुशवाहा का यह कहना कि “पुत्र मोह नहीं, पार्टी सर्वोपरि है”, उनकी इसी लाचारी को दिखाता है।
गौरतलब है कि इससे पहले भी जब दीपक प्रकाश को सीधे मंत्री बनाया गया था, तब रालोमो के भीतर ही परिवारवाद के खिलाफ बगावत शुरू हो गई थी। उस वक्त चर्चा थी कि कुशवाहा की पार्टी का भाजपा में विलय हो जाएगा। अब इतने दिनों बाद कुशवाहा द्वारा उन खबरों को ‘प्रायोजित’ बताना यह साबित करता है कि वे डैमेज कंट्रोल की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि अगर ऐसा था तो उनकी प्रतिक्रिया उसी वक्त आनी चाहिए थी।

भाजपा से वैचारिक दूरी और जदयू से नजदीकी की पैंतरेबाज़ी
अपनी मजबूत और स्वाभिमानी राजनीति के लिए जाने जाने वाले उपेंद्र कुशवाहा ने मंच से एक और बड़ा दांव खेला। उन्होंने कहा कि “जदयू और रालोमो की विचारधारा एक जैसी है, जबकि भाजपा की विचारधारा अलग है।” हालांकि, एनडीए में बने रहने की मजबूरी के कारण उन्होंने तुरंत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ भी की और कहा कि देश के लिए वे सबसे फिट नेता हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, कुशवाहा का यह बयान उनके भविष्य की राजनीति का संकेत है। वे भाजपा के साथ सत्ता के साझेदार तो बने रहना चाहते हैं, लेकिन साथ ही जदयू के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर दिखाकर अपने समर्थकों को बिखरने से रोकने की हताश कोशिश भी कर रहे हैं।

ललन सिंह के दावे को चुनौती: निशांत कुमार पर नया विवाद
कुशवाहा ने नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को उनका ‘वास्तविक उत्तराधिकारी’ घोषित कर बिहार की राजनीति में नया बारूद डाल दिया है। कुशवाहा ने कहा कि निशांत कुमार को डिप्टी सीएम बनाया जाना चाहिए था, जिससे जदयू को मजबूती मिलती। यह बयान सीधे तौर पर एनडीए के आधिकारिक स्टैंड को चुनौती देता है। इसके पूर्व, जदयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि नीतीश कुमार ने खुद भाजपा नेता और वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुना है। ऐसे में सम्राट चौधरी के मुकाबले निशांत कुमार का नाम आगे बढ़ाना, उपेंद्र कुशवाहा की भाजपा (विशेषकर सम्राट चौधरी के नेतृत्व) के प्रति बढ़ती असहजता और एनडीए के अंदरूनी ‘लव-कुश’ समीकरण की रस्साकशी को उजागर करता है।

सांगठनिक फेरबदल से ताकत दिखाने की कोशिश
इस हंगामे के बीच रालोमो के सांगठनिक चुनाव की प्रक्रिया भी पूरी की गई। उपेंद्र कुशवाहा ने सर्वसम्मति से विधायक आलोक कुमार सिंह को पार्टी का नया प्रदेश अध्यक्ष घोषित किया। इसके अलावा प्रशांत कुमार पंकज और सुभाष चंद्र चंद्रवंशी को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष तथा हिमांशु पटेल को प्रधान महासचिव बनाया गया है।