नीतीश का राज्यसभा सफर: उम्र, सेहत और सत्ता की रणनीति के बीच लिया गया फैसला

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक सवाल लगातार तैर रहा था—क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे? अब जब उन्होंने खुद सोशल मीडिया के जरिए राज्यसभा जाने की इच्छा जताई है, तो यह सवाल और भी गहरा हो गया है कि क्या यह सचमुच उनकी व्यक्तिगत इच्छा है, या इसके पीछे सत्ता की कोई बड़ी रणनीति काम कर रही है।

औपचारिक तौर पर यह घोषणा भले ही नीतीश कुमार की तरफ से आई हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इस फैसले की पटकथा कहीं और लिखी गई। बिहार विधानसभा चुनाव के समय ही भाजपा और जदयू के बीच सीट बंटवारे को लेकर तनाव खुलकर सामने आने लगा था। उस समय तलवार खिंचते-खिंचते रह गई थी, लेकिन भाजपा की रणनीति और तेवर साफ नजर आने लगे थे।

चुनाव परिणाम आने के बाद भी भाजपा के स्तर पर यह कोशिश हुई कि नीतीश कुमार स्वयं मुख्यमंत्री पद छोड़ दें और सत्ता का नया संतुलन बनाया जाए। लेकिन उस समय नीतीश इसके लिए तैयार नहीं हुए। यही कारण है कि अब जब वे खुद राज्यसभा जाने को अपनी इच्छा बता रहे हैं, तो राजनीतिक विश्लेषक इसे परिस्थितियों से उपजा निर्णय मान रहे हैं।

दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम के पीछे तीन बड़े कारण माने जा रहे हैं—नीतीश कुमार की बढ़ती उम्र, उनकी सेहत को लेकर लगातार उठती चिंताएं और जदयू के भविष्य को लेकर भाजपा की रणनीतिक सोच। पिछले कुछ महीनों से यह चर्चा बार-बार सामने आ रही थी कि बिहार में मुख्यमंत्री का चेहरा बदल सकता है और भाजपा अपना नेता आगे कर सकती है।

इस बीच जदयू के भीतर भी कुछ नेता ऐसे रहे जिन्होंने संभावित ‘एग्जिट प्लान’ की रूपरेखा तैयार करने में भूमिका निभाई। राजनीतिक चर्चाओं में ललन सिंह, संजय झा और विजय चौधरी जैसे नेताओं के नाम सामने आते रहे हैं, जिन्हें नीतीश कुमार के बाद की रणनीति का सूत्रधार माना जाता है।

नीतीश कुमार की राजनीतिक स्थिति के कमजोर होने का एक प्रतीकात्मक उदाहरण भी अक्सर दिया जाता है। पहली बार ऐसा हुआ कि सरकार बनने और मुख्यमंत्री बनने के बावजूद गृह विभाग उनके पास नहीं रहा। यह विभाग किसी और को दिया गया। इसी तरह भाजपा ने सम्राट चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनाकर यह संकेत भी दिया कि आने वाले समय में नेतृत्व की नई संरचना तैयार की जा रही है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी हाल के बयान में नीतीश कुमार की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने बिहार को ‘जंगलराज’ से मुक्त कराया और उनका सार्वजनिक जीवन बेहद सादगीपूर्ण तथा शुचितापूर्ण रहा है। इस तरह की प्रशंसा को भी राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है—जहाँ एक ओर सम्मान दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सत्ता के नए अध्याय की जमीन तैयार की जा रही है।

राज्यसभा में नीतीश कुमार का कार्यकाल 10 अप्रैल से शुरू होगा। इसके साथ ही एक और राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है—उनके पुत्र निशांत कुमार के राजनीति में प्रवेश की संभावना। माना जा रहा है कि विधान परिषद में नीतीश कुमार का जो कार्यकाल 2030 तक का है, उसे उनके स्थान पर निशांत को दिया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह जदयू की अगली पीढ़ी की राजनीति की शुरुआत होगी।

सच यह है कि नीतीश कुमार की सेहत को लेकर पिछले कुछ समय से लगातार अटकलें लग रही थीं। कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना था कि उनके लिए पूरे कार्यकाल तक सक्रिय मुख्यमंत्री बने रहना मुश्किल हो सकता है। लेकिन मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी राजनीतिक यात्रा का विराम इतनी जल्दी आ जाएगा, इसका अनुमान शायद ही किसी ने लगाया था।

हालांकि सत्ता की इस बदलती पटकथा के बीच यह भी उतना ही बड़ा सच है कि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। उन्हें ‘विकास पुरुष’ की उपाधि यूं ही नहीं मिली। बिहार को एक कठिन दौर से बाहर निकालने और प्रशासनिक ढांचे को व्यवस्थित करने में उनकी भूमिका को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है।

उनके कार्यकाल में कई ऐसी योजनाएं लागू हुईं जिन्होंने सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे पर गहरा असर डाला। त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था और नगर निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्होंने स्थानीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को नई दिशा दी। मुख्यमंत्री बालिका पोशाक योजना और साइकिल योजना ने लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा दिया। जीविका समूहों के जरिए ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करने की कोशिश की गई।

इसके अलावा शराबबंदी कानून, सरकारी नौकरियों और पुलिस बल में महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण, ग्रामीण सड़कों का व्यापक विस्तार और गांव-गांव तक सड़क कनेक्टिविटी जैसे फैसले भी उनके शासनकाल की पहचान बने। कोसी और गंगा पर कई बड़े पुलों का निर्माण, बिजली व्यवस्था में सुधार और हर घर नल योजना जैसी पहलें भी इसी दौर में लागू हुईं।

शिक्षा के क्षेत्र में चाणक्य लॉ यूनिवर्सिटी, आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थानों की स्थापना की गई। अपराध नियंत्रण के लिए स्पीडी ट्रायल की व्यवस्था लागू की गई। जल-जीवन-हरियाली अभियान, पक्की गली-नाली योजना, पर्यटन को बढ़ावा देने की पहल, पटना में गंगा पथ और इको पार्क का निर्माण भी इसी दौर की प्रमुख उपलब्धियां मानी जाती हैं।

लोक सेवाओं का अधिकार कानून लागू कर प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश की गई, जबकि कृषि रोडमैप के तहत हर खेत तक पानी पहुंचाने की योजना को आगे बढ़ाया गया।

यानी बिहार की राजनीति में यह एक दिलचस्प मोड़ है। एक ओर सत्ता का नया समीकरण बन रहा है, तो दूसरी ओर एक लंबे राजनीतिक अध्याय का धीरे-धीरे समापन भी दिख रहा है। सवाल यही है कि क्या यह सचमुच एक स्वाभाविक राजनीतिक संक्रमण है, या फिर दबाव और रणनीति से तैयार की गई एक नई पटकथा—जिसका असली असर आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में दिखाई देगा।