चुनाव की सरगर्मी के बीच भागलपुर के एक गांव में सुलग रही है एक अलग ही आग… जिसने 1500 परिवारों की जिंदगी जला दी

मदन, भागलपुर
बिहार में चुनावी तापमान चरम पर है… भागलपुर जिले के सातों विधानसभा क्षेत्रों में चर्चा है बस वोट की, नेताओं की, वादों और इरादों की। लेकिन… इन्हीं चर्चाओं के बीच भागलपुर के जगदीशपुर प्रखंड के चांदपुर गांव में एक अलग ही आग सुलग रही है —
एक ऐसी आग, जिसने 1500 परिवारों की ज़िंदगी जला दी है।
यह कहानी किसी चुनावी वादे की नहीं… बल्कि उन महिलाओं की चीख़ की कहानी है, जिन्हें रोज़गार और ज़मीन का सपना दिखाकर 6 करोड़ रुपए की ठगी कर ली गई।
कहा जाता है — गांव की औरत सबसे पहले भरोसा करती है… और आख़िरी तक टूटती नहीं। चांदपुर की महिलाएं भी भरोसे के उसी धागे में बंधी थीं —
एक युवक के शब्दों से बुने सपनों में।
उसका नाम था — आयुष झा। चेहरे पर सलीकेदार मुस्कान, बातों में विश्वास… और दिमाग़ में ठगी का ऐसा जाल, जिसमें गांव की औरतें एक-एक कर फंसती चली गईं।

आयुष ने कहा था —“आपके नाम पर बैंक से लोन दिलवाऊंगा…हर परिवार को ज़मीन और नौकरी दूंगा।
मैं पेट्रोल पंप खोल रहा हूं, जिसमें गांव के सभी लोगों को काम मिलेगा।”
औरतें खुश हुईं —किसी ने 2 लाख का लोन लिया,
किसी ने 7 लाख तक का। बैंक से रकम आई, लेकिन पैसे उनके हाथ तक नहीं पहुंचे। सब कुछ आयुष के पास चला गया। शुरूआती कुछ महीनों तक उसने किस्तें भी जमा कीं, ताकि किसी को शक न हो।
और फिर अचानक…किस्तें बंद हो गईं, फोन बंद हो गया और सपना भी।
जब बैंकों के नोटिस आने लगे, तब महिलाओं को सच्चाई का एहसास हुआ। घर-घर में झगड़े शुरू हो गए। पति बोले —“लोन तुम्हारे नाम पर है, अब चुकाएगा कौन ?”
लाखों का कर्ज़ सिर पर आ गया और उम्मीदें ज़मीन में गड़ गईं। रेशम देवी बताती हैं —“आयुष ने कहा था कि मेरे बड़े लोगों से संपर्क हैं। कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे।”
लक्ष्मी देवी की आंखें भर आई —“हमने सोचा रोजगार मिलेगा, अब घर चलाना भी मुश्किल हो गया।”

जगदीशपुर थाने में पांच दिन पहले सैकड़ों महिलाएं पहुंचीं। हाथों में आवेदन, आंखों में आंसू और एक ही मांग —“हमें न्याय चाहिए।”थानाध्यक्ष अभय शंकर कहते हैं —“आवेदन मिला है, जांच जारी है।”
पर सवाल यह है कि —जांच से पहले क्या इन औरतों के टूटे सपनों को कोई जोड़ पाएगा? क्या कोई नेता, कोई अधिकारी इन 1500 परिवारों के कर्ज़ की जिम्मेदारी लेगा?

यह कहानी सिर्फ ठगी की नहीं है —यह उस भरोसे के टूटने की कहानी है, जो गांव की औरतें अपने भविष्य पर करती हैं। आज चुनावी पोस्टरों के बीच उनके आंगन में लटक रहे हैं बैंक के नोटिस, और सवाल अब भी वही है —“क्या हमें हमारा हक़ मिलेगा?”

भागलपुर की यह कहानी सिर्फ ठगी की नहीं,
यह चुनावी वादों के साए में दबे दर्द की कहानी है।
जहां 1500 महिलाएं आज भी सोच रही हैं —“क्या अगली सरकार हमारी ज़िंदगी से ठगी मिटा पाएगी?”