बिहार पंचायत चुनाव 2026 : ‘ट्रिपल टेस्ट’ के चक्रव्यूह में फंसा इलेक्शन, तय समय पर क्यों नामुमकिन लग रहा मतदान?

बिहार में आगामी पंचायत और ग्राम कचहरी चुनावों पर अनिश्चितता के गहरे बादल मंडरा रहे हैं। राज्य सरकार ने पटना हाई कोर्ट के समक्ष स्पष्ट कर दिया है कि परिसीमन, आरक्षण का नया खाका और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) के लिए अनिवार्य ‘ट्रिपल टेस्ट’ की जटिल प्रक्रिया के कारण तय समय-सीमा के भीतर चुनाव कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। आइए समझते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह ‘ट्रिपल टेस्ट’ नियम क्या है और कैसे इसने बिहार की पंचायती राज व्यवस्था में एक बड़ा संवैधानिक और प्रशासनिक पेंच फंसा दिया है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
जानिए कि समय पर चुनाव क्यों नहीं हो सकते? संविधान के अनुच्छेद 243-E के तहत, वर्तमान पंचायतों और ग्राम कचहरियों का कार्यकाल खत्म होने (दिसंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच) से पहले नए चुनाव संपन्न कराना राज्य निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व है। हालांकि, हाईकोर्ट में हुई हालिया सुनवाई में प्रशासनिक तैयारियों का हवाला देते हुए सरकार ने समय पर चुनाव कराने से हाथ खड़े कर दिए हैं। इस मामले की अगली सुनवाई अब 26 नवंबर को मुकर्रर की गई है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि चुनाव टलते हैं, तो राज्य निर्वाचन आयोग वर्तमान कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव प्रक्रिया पूरी नहीं करा पाएगा। ऐसे में राज्य सरकार को पंचायतों के सुचारू संचालन के लिए ‘प्रशासनिक परामर्श समिति’ का गठन करना पड़ सकता है या कोई अन्य वैकल्पिक व्यवस्था लानी होगी।

क्या है ‘ट्रिपल टेस्ट’ जिसने लगाई इलेक्शन पर ब्रेक?
स्थानीय निकायों में अति पिछड़ा वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ‘ट्रिपल टेस्ट’ (Triple Test) को अनिवार्य किया है। यह एक त्रिस्तरीय जटिल प्रक्रिया है, जिसे पूरा किए बिना चुनाव नहीं कराए जा सकते:
समर्पित आयोग का गठन: राज्य को एक स्वतंत्र आयोग बनाना होगा, जो प्रत्येक स्थानीय निकाय में राजनीतिक पिछड़ेपन का गहराई से अध्ययन करे।
आरक्षण अनुपात का निर्धारण: आयोग की रिपोर्ट के आधार पर प्रत्येक स्थानीय निकाय में पिछड़ेपन की प्रकृति के अनुसार आरक्षण का अनुपात तय किया जाएगा।
50 प्रतिशत की सीमा: यह सुनिश्चित करना सबसे अहम है कि एससी, एसटी और अति पिछड़ों का कुल आरक्षण किसी भी स्थिति में 50 प्रतिशत की सीमा को पार न करे।

बिहार में इस प्रक्रिया की जमीनी हकीकत
बिहार में हालिया जातिगत सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) की श्रेणी में कुल 112 जातियां आती हैं। पंचायती राज में इन्हें 20 प्रतिशत तक का आरक्षण लागू करने के लिए एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है। राज्य सरकार ने प्रतिष्ठित ‘एएन सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान’ को ‘ट्रिपल टेस्ट’ से जुड़े विस्तृत अध्ययन का जिम्मा सौंपा है।

वर्तमान में संस्थान के शोधार्थी, विशेषज्ञ और अति पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य गांव-गांव जाकर ईबीसी की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का आकलन कर रहे हैं। यह एक बेहद विस्तृत और समय लेने वाला डाटा कलेक्शन अभियान है।

दांव पर हैं लाखों पंचायत प्रतिनिधियों का भविष्य
बिहार में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था एक विशाल ढांचा है। चुनाव टलने से इन लाखों पदों के नए गठन पर सीधा असर पड़ेगा।
एक नजर बिहार के पंचायत पदों के मौजूदा आंकड़ों पर :

मुखिया: 8,053 पद

सरपंच: 8,053 पद

पंचायत समिति सदस्य: 11,085 पद

जिला परिषद सदस्य: 1,160 पद

वार्ड सदस्य: 1,09,635 पद

वार्ड पंच: 1,09,635 पद

बिहार सरकार के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती ‘ट्रिपल टेस्ट’ के आंकड़ों को कानूनी और वैज्ञानिक रूप से पुख्ता तरीके से तैयार करना है। जब तक एएन सिन्हा संस्थान और आयोग अपनी रिपोर्ट सौंपकर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन नहीं करते, तब तक बिहार के ग्रामीण मतदाताओं को अपनी नई पंचायत चुनने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।