न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार विधानसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक जीत और रिकॉर्ड 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद नीतीश कुमार ने अपने ‘मिशन 1 करोड़ रोजगार’ को जमीन पर उतारने के लिए सरकार के ढांचे में बड़ा बदलाव किया है। नई एनडीए सरकार ने प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ी ‘सर्जरी’ करते हुए तीन नए विभागों के गठन का एलान किया है। यह फैसला केवल विभागों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिहार की उस पुरानी समस्या पर सीधा प्रहार है, जिसने दशकों से राज्य की युवा शक्ति को पलायन के लिए मजबूर किया है।
तीन नए विभाग: सरकार का नया फोकस नीतीश सरकार ने जिन तीन नए विभागों को मंजूरी दी है, वे हैं:
युवा, रोजगार और कौशल विकास विभाग : इसका एकमात्र एजेंडा अगले 5 साल (2025-30) में 1 करोड़ रोजगार सृजित करना होगा।
उच्च शिक्षा विभाग : इसे शिक्षा विभाग से अलग करके एक स्वतंत्र विभाग बनाया गया है।
नागरिक उड्डयन विभाग (Civil Aviation): राज्य में बढ़ते एयरपोर्ट नेटवर्क को देखते हुए इसकी जरूरत महसूस की गई।
इसके अलावा, एमएसएमई (MSME) निदेशालय और ‘बिहार मार्केटिंग प्रमोशन कॉरपोरेशन’ का गठन भी किया जा रहा है, जो कुटीर उद्योगों को बाजार उपलब्ध कराएगा।
उच्च शिक्षा को अलग करने की जरूरत क्यों पड़ी?
बिहार में शिक्षा विभाग हमेशा से प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के भारी-भरकम बोझ तले दबा रहा है। इसका सीधा असर विश्वविद्यालयों पर पड़ा। शैक्षणिक सत्रों में देरी (Late Sessions) और प्रोफेसरों की कमी बिहार के उच्च शिक्षा जगत की पहचान बन गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘उच्च शिक्षा विभाग’ के अलग होने से अब विश्वविद्यालयों की मॉनिटरिंग सीधे तौर पर हो सकेगी। अगर बिहार को ‘एजुकेशन हब’ बनाना है, तो उच्च शिक्षा को स्कूलों की भीड़ से अलग करना एक अनिवार्य कदम था।
रोजगार के आंकड़े और पलायन की कड़वी सच्चाई सरकार ने ‘युवा, रोजगार और कौशल विकास विभाग’ बनाकर यह स्वीकार कर लिया है कि रोजगार अब साइड-प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि मेनस्ट्रीम एजेंडा है।
PLFS (Periodic Labour Force Survey) के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में बेरोजगारी दर 5.2% है, जो राष्ट्रीय औसत से थोड़ी कम है, लेकिन असली समस्या ‘लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट’ (LFPR) है। बिहार में काम करने योग्य आबादी में से आधे से कम (48.8%) ही काम की तलाश कर रहे हैं। युवाओं (15-29 वर्ष) में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक (33.9%) है।
2011 की जनगणना और पलायन
उत्तर प्रदेश के बाद बिहार दूसरा राज्य है जहां से सबसे ज्यादा पलायन होता है। 30% बिहारी युवा सिर्फ रोजगार की तलाश में घर छोड़ते हैं। नया विभाग अगर हर जिले में ‘मेगा स्किल सेंटर’ और एमएसएमई (MSME) क्लस्टर बनाने में सफल रहा, तो यह पलायन रोकने में ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकता है।
सियासी रस्साकशी
एजेंडा किसका? इस प्रशासनिक फेरबदल पर राजनीति भी शुरू हो गई है। राजद (RJD) का दावा है कि रोजगार को विमर्श के केंद्र में लाने का श्रेय तेजस्वी यादव को जाता है। राजद प्रवक्ता सुबोध कुमार मेहता का कहना है, “नीतीश कुमार पहले जिस रोजगार के मुद्दे को नकारते थे, आज उसी एजेंडे पर चलने को मजबूर हैं। यह विपक्ष की नैतिक जीत है।” वहीं, जदयू और भाजपा इसे जनादेश का सम्मान बता रहे हैं। जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार के मुताबिक, “महिला रोजगार योजना और नए विभाग एनडीए के ‘विकसित बिहार’ के रोडमैप का हिस्सा हैं।”
राह आसान नहीं
5 साल में 1 करोड़ रोजगार यानी हर साल 20 लाख रोजगार का लक्ष्य… यह सुनने में जितना आकर्षक है, जमीन पर उतारना उतना ही चुनौतीपूर्ण। बिहार में 40 विभाग हो गए हैं, लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ‘सिविल एविएशन’ जैसे विभाग क्या सिर्फ दरभंगा और पटना एयरपोर्ट तक सीमित रहेंगे या पूर्णिया और भागलपुर जैसे शहरों को भी पंख देंगे? और क्या नया ‘रोजगार विभाग’ सरकारी फाइलों से निकलकर युवाओं के हाथों तक नियुक्ति पत्र पहुंचा पाएगा?

































