बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाने के उद्देश्य से नीतीश सरकार ने एक बड़ा और साहसिक निर्णय लिया है। राज्य के सरकारी डॉक्टर अब ‘निजी प्रैक्टिस’ नहीं कर सकेंगे। सरकार के ‘सात निश्चय-3’ कार्यक्रम के तहत लिए गए इस फैसले का उद्देश्य अस्पतालों में डॉक्टरों की उपस्थिति सुनिश्चित करना और गरीबों को मुफ्त इलाज का लाभ दिलाना है। लेकिन, सवाल वही है, क्या यह कागजी आदेश धरातल पर सफल हो पाएगा?
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
सरकार ने स्पष्ट किया है कि निजी प्रैक्टिस पर रोक के बदले डॉक्टरों को ‘नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस’ (NPA) दिया जाएगा, जो उनके मूल वेतन का 25 प्रतिशत तक हो सकता है। स्वास्थ्य सचिव लोकेश कुमार सिंह के अनुसार, इसके लिए जल्द ही विस्तृत नियमावली और गाइडलाइन जारी की जाएगी। यह नियम मेडिकल कॉलेजों, जिला अस्पतालों और IGIC जैसे संस्थानों पर तत्काल प्रभाव से लागू माना जा रहा है।
क्या इसे व्यावहारिक तौर पर लागू करना संभव है?
अतीत का अनुभव बताता है कि बिहार में 1990 से लेकर 2022 तक कई बार ऐसी कोशिशें हुईं, लेकिन डॉक्टरों के विरोध और हड़ताल के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा।
इस बार भी इसे लागू करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा :-
- निगरानी की बड़ी चुनौती: सबसे बड़ी चुनौती ‘चोरी-छिपे’ होने वाली प्रैक्टिस को रोकना है। डॉक्टर अक्सर अपने घरों या पार्टनरशिप वाले नर्सिंग होम में मरीज देखते हैं। बिना सख्त बायोमेट्रिक हाजिरी और इंटेलिजेंस टीम के सक्रिय हुए, इस ‘सिंडिकेट’ को तोड़ना मुश्किल है।
- विशेषज्ञ डॉक्टरों का पलायन: एक बड़ा डर यह है कि विशेषज्ञ (Specialist) डॉक्टर NPA के बदले निजी प्रैक्टिस की मोटी कमाई को चुनेंगे। अगर वे सरकारी नौकरी छोड़ते हैं, तो पहले से ही डॉक्टरों की कमी झेल रहे बिहार के सरकारी अस्पतालों में ‘स्पेशलिस्ट’ का संकट गहरा सकता है।
क्या सरकारी संसाधन निपटने के लिए तैयार हैं?
केवल डॉक्टरों को अस्पताल में बैठा देने से इलाज नहीं सुधरेगा। नीति सही है लेकिन बुनियादी ढांचे पर सवालिया निशान हैं:
मशीनें और दवाएं: यदि अस्पतालों में जांच की मशीनें खराब हैं या ऑपरेशन थिएटर (OT) चालू नहीं हैं, तो डॉक्टर की उपस्थिति के बावजूद मरीज को बाहर के निजी क्लीनिक में ही जाना पड़ेगा।
मरीजों का दबाव: निजी प्रैक्टिस बंद होने से सरकारी ओपीडी में मरीजों की संख्या अचानक कई गुना बढ़ जाएगी। क्या हमारे सदर अस्पताल और मेडिकल कॉलेज इस भारी भीड़ को संभालने के लिए पर्याप्त पैरामेडिकल स्टाफ और बेड रखते हैं?
नियत और नीति का इम्तिहान
तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह मॉडल सफल है, लेकिन बिहार में इसे सफल बनाने के लिए सरकार को ‘डंडे’ के साथ-साथ ‘सुविधाओं’ का भी सहारा लेना होगा। यदि सरकार अस्पतालों में विश्वस्तरीय जांच सुविधाएं और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं करती, तो डॉक्टर अस्पताल में तो रहेंगे, लेकिन मरीज फिर भी बाहर ही जाएगा।
यह फैसला केवल एक आदेश नहीं, बल्कि बिहार के स्वास्थ्य ढांचे की ‘सर्जरी’ है। अब देखना यह है कि नई सरकार और विभाग इसे कितनी इच्छाशक्ति के साथ लागू कर पाते हैं।
































