नीतीश की ‘दिल्ली से वापसी’ और हरिवंश का ‘राज्यसभा कार्ड’ … क्या एनडीए में सब ठीक है?

बिहार में नई सरकार के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद दिल्ली का घटनाक्रम सामान्य नजर नहीं आ रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जिन्होंने दिल्ली पहुंचते ही दो-तीन दिन रुकने की बात कही थी, वे और भाजपा के शीर्ष नेता अचानक पटना लौट आए। आधिकारिक तौर पर इसे बैठकों का टलना बताया जा रहा है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे एक गहरे ‘डेडलॉक’ यानी गतिरोध के रूप में देख रहे हैं।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना/दिल्ली
दिल्ली में ‘प्लान’ का अचानक बदलना
दिल्ली में भाजपा के शीर्ष नेताओं की बैठक अमित शाह की बंगाल यात्रा के नाम पर टाल दी गई। सवाल यह है कि अमित शाह का बंगाल दौरा पहले से तय था, तो बैठकें अचानक कैंसिल क्यों हुईं? नीतीश कुमार का शपथ ग्रहण के दौरान “उत्साहहीन” दिखना और फिर दिल्ली से आनन-फानन में लौटना इस बात की पुष्टि करता है कि पर्दे के पीछे कुछ बड़ा घट रहा है।

हरिवंश नारायण सिंह: विवाद की असली जड़?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस तनाव का केंद्र हरिवंश नारायण सिंह का राज्यसभा के लिए मनोनयन है। बिना पूछे फैसला? जेडीयू के भीतर यह संदेश गया है कि भाजपा ने अपनी पसंद के व्यक्ति यानी हरिवंश को राज्यसभा भेजने का फैसला जेडीयू नेतृत्व की सहमति के बिना लिया है। चर्चा है कि हरिवंश को फिर से राज्यसभा का उपसभापति बनाया जा सकता है। ऐसे में स्थिति यह होगी कि जिस राज्यसभा में नीतीश कुमार एक सामान्य सदस्य के तौर पर जाएंगे, उसी सदन में हरिवंश उनके ‘उप-मुखिया’ की भूमिका में होंगे। यह नीतीश कुमार के राजनीतिक कद के लिए एक असहज स्थिति हो सकती है।

विजय चौधरी का कड़ा बयान: संकेत क्या हैं?
नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद मंत्री विजय कुमार चौधरी के तेवर इस बार बदले हुए हैं। दिल्ली से लौटने के बाद उनका यह बयान, “राज्यसभा की सदस्यता लेने से बिहार में सरकार नहीं बनती, सरकार इस्तीफा देने के बाद बनती है”…एक सीधा हमला माना जा रहा है। यह बयान दर्शाता है कि जेडीयू फिलहाल बैकफुट पर रहने के मूड में नहीं है।

हरिवंश क्यों हैं भाजपा के लिए ‘जरूरी’ और नीतीश के लिए ‘असहज’?
हरिवंश जी केवल एक पत्रकार या राजनेता नहीं हैं, बल्कि वे भाजपा और जेडीयू के बीच के ‘सेतु’ रहे हैं। 2016 का इतिहास: जब 2016 में नोटबंदी हुई थी और जेडीयू विरोध कर रही थी, तब हरिवंश ने ही नीतीश कुमार को इसके पक्ष में राजी किया था। हरिवंश की वजह से ही 2010 से चली आ रही मोदी-नीतीश की तल्खी खत्म हुई थी और नीतीश महागठबंधन छोड़कर एनडीए में आए थे। भाजपा उन्हें फिर से महत्वपूर्ण भूमिका देकर जेडीयू के भीतर अपना एक मजबूत प्रभाव बनाए रखना चाहती है, जो शायद नीतीश कुमार और उनके करीबी नेताओं को पसंद नहीं आ रहा।

क्या होगा अगला कदम?
यह स्पष्ट है कि एक तात्कालिक ‘डेडलॉक’ पैदा हो गया है। अमित शाह इस गतिरोध को तोड़ने के लिए जल्द ही पटना आ सकते हैं या संजय झा जैसे नेताओं के माध्यम से मध्यस्थता की कोशिश की जा सकती है। भाजपा बिहार में फिलहाल किसी भी तरह की अस्थिरता नहीं चाहेगी, लेकिन हरिवंश के मुद्दे पर जेडीयू का रुख आने वाले दिनों में गठबंधन की दिशा तय करेगा।