बिहार की राजनीति इस वक्त उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ हर मुस्कुराहट के पीछे एक नया समीकरण छिपा है और हर बयान के पीछे एक गहरा इशारा। शुक्रवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा की सदस्यता की शपथ लेकर पटना लौट आए, लेकिन उनके साथ आए मंत्री विजय चौधरी के एक बयान ने राज्य के सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना/दिल्ली
पटना एयरपोर्ट पर जब पत्रकारों ने सरकार गठन को लेकर सवाल किया, तो नीतीश कुमार ने चुप्पी साधे रखी, लेकिन विजय चौधरी ने सधे हुए अंदाज में कहा, “सिर्फ सदस्यता ग्रहण करने से सरकार नहीं बनती, सरकार इस्तीफा देने से बनती है।” राजनीतिक विश्लेषक इस बयान को ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ के रूप में देख रहे हैं। विजय चौधरी का यह कहना कि “अभी समय है, इंतजार कीजिए”, इस बात का संकेत है कि पर्दे के पीछे अभी भी सौदेबाजी जारी है। नीतीश कुमार विधान परिषद से इस्तीफा दे चुके हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पद से उनके इस्तीफे की टाइमिंग ही नई सरकार की दिशा तय करेगी।
क्या ‘गृह मंत्रालय’ बन गया है गले की फांस?
सूत्रों की मानें तो एनडीए की नई सरकार में विभागों के बंटवारे को लेकर पेंच फंस गया है। बीजेपी की मांग: इस बार बीजेपी न केवल मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा मजबूत कर रही है, बल्कि वह गृह विभाग (Home Department) भी अपने पास रखना चाहती है। बीजेपी का तर्क है कि राज्य की कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए गृह मंत्रालय उनके पास होना जरूरी है।
जेडीयू का स्टैंड: नीतीश कुमार पिछले दो दशकों से गृह मंत्रालय अपने पास रखते आए हैं। जेडीयू का तर्क है कि अगर नेतृत्व (CM पद) बदला जाता है, तो शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए गृह विभाग जेडीयू के कोटे में रहना चाहिए।
दिल्ली में बैठक रद्द: रणनीति या चुनावी व्यस्तता?
बिहार के भविष्य को लेकर दिल्ली में विनोद तावड़े के आवास पर होने वाली बीजेपी कोर कमेटी की महत्वपूर्ण बैठक का अचानक रद्द होना कई सवाल खड़े कर रहा है। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इसे बड़े नेताओं की चुनावी व्यस्तता बताया जा रहा है, लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा है कि जब तक पटना से ‘फाइनल सिग्नल’ नहीं मिलता, तब तक दिल्ली में कोई भी औपचारिक फैसला लेना मुश्किल है। सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा जैसे बड़े नेताओं का दिल्ली में मौजूद होना और फिर बैठक का टलना किसी गतिरोध की ओर इशारा करता है।
बिना मिले लौटे नीतीश: मौन के मायने
नीतीश कुमार का पीएम मोदी और अमित शाह से बिना मिले वापस पटना लौटना भी एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। प्रधानमंत्री ने उन्हें बधाई जरूर दी, लेकिन आमने-सामने की मुलाकात न होना यह दर्शाता है कि नीतीश कुमार अभी अपनी शर्तों पर अडिग हैं। 2026 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए बीजेपी और जेडीयू दोनों ही कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहते जो उनके कोर वोट बैंक को नुकसान पहुँचाए।
बिहार की सत्ता का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह आने वाले 48 घंटों में साफ हो सकता है। फिलहाल, गेंद नीतीश कुमार के पाले में है और उनका ‘इस्तीफा’ ही नई सरकार की पहली ईंट बनेगा।
































