बिहार की जीवनरेखा मानी जाने वाली गंगा और उसकी सहायक नदियाँ आज प्रदूषण के सबसे बुरे दौर से गुजर रही हैं। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की हालिया जांच ने उस कड़वी सच्चाई को उजागर किया है, जिसे अब तक ‘बायो-रेमेडिएशन’ के दावों के पीछे छिपाया गया था। मानक उपचार (Standard Treatment) के बिना नदियों में गिर रहा सीवेज न केवल पानी को जहरीला बना रहा है, बल्कि पूरी जैव-विविधता को खत्म कर रहा है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
जानिए कि इससे क्या प्रमुख खतरे हैं और पर्यावरणीय प्रभाव क्या है। समझ लीजिए कि नदियां ‘डेड जोन’ में तब्दील होती जा रही है। जब बिना ट्रीटमैंट पानी नदियों में गिरता है, तो उसमें मौजूद कार्बनिक पदार्थ ऑक्सीजन की भारी खपत करते हैं। इससे पानी में बीओडी (Biochemical Oxygen Demand) का स्तर बढ़ जाता है और घुलनशील ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) कम हो जाती है। इससे पानी में ऑक्सीजन की कमी से मछलियाँ और अन्य जलीय जीव दम तोड़ने लगते हैं, जिससे नदियाँ ‘डेड जोन’ बन जाती हैं। बिहार की नदियों में ‘गंगेय डॉल्फिन’ जैसे दुर्लभ जीव पाए जाते हैं। 507 नालों का अनियंत्रित कचरा इनके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहा है। भारी धातुओं (Heavy Metals) और रसायनों के कारण जलीय पौधों की श्रृंखला भी बाधित हो रही है।
समझ लीजिए कि भूजल ‘स्लो पॉइजन’ बनता जा रहा है। नदियों का प्रदूषित जल रिसकर (Leaching) भूजल स्तर तक पहुँचता है। बिहार के मैदानी इलाकों में लोग आज भी हैंडपंप और कुओं पर निर्भर हैं। दूषित पानी से हैजा, टाइफाइड, हेपेटाइटिस और त्वचा संबंधी बीमारियां महामारी का रूप ले सकती हैं। लंबे समय तक ऐसे पानी के संपर्क में रहने से कैंसर जैसी घातक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। नदियों के किनारे होने वाली खेती में इसी प्रदूषित पानी का उपयोग होता है। पानी में मौजूद हानिकारक रसायन और बैक्टीरिया फसलों के जरिए मानव शरीर तक पहुँच रहे हैं, जो आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा है।
रिपोर्ट के अनुसार, जिस निजी एजेंसी को ‘बायो-रेमेडिएशन’ (सूक्ष्मजीवों द्वारा उपचार) का जिम्मा दिया गया था, वह विफल रही। केवल कागजों पर सूक्ष्मजीवों का छिड़काव करने से नालों का पानी शुद्ध नहीं होता। इसके लिए पीएच (pH), टीडीएस (TDS) और सीओडी (COD) जैसे पांचों मानकों पर खरा उतरना अनिवार्य है। पटना जैसे बड़े शहरों में भी सभी नालों का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से न जुड़ना प्रशासनिक सुस्ती को दर्शाता है।
गंगा जैसी पवित्र नदियों का आचमन योग्य न रहना करोड़ों लोगों की आस्था पर चोट है। मछलियों के मरने और जलीय जीवन खत्म होने से इस व्यवसाय पर निर्भर लाखों परिवारों की रोजी-रोटी छिन रही है। बिहार की नदियों को बचाने के लिए अब केवल जुर्माना लगाना या एजेंसी को ‘ब्लैक लिस्ट’ करना काफी नहीं है। हर बड़े नाले के मुहाने पर छोटे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अनिवार्य होने चाहिए। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को रियल-टाइम डेटा मॉनिटरिंग सिस्टम अपनाना होगा। जब तक नागरिक नदियों को ‘डस्टबिन’ समझना बंद नहीं करेंगे, सरकारी प्रयास विफल ही रहेंगे। अगर आज 507 नालों को नहीं रोका गया, तो कल बिहार की नदियाँ केवल इतिहास के पन्नों और सरकारी फाइलों में ही जीवित बचेंगी।
































