बिहार में ‘पाताल’ की ओर जाता पानी: 14 जिलों में खतरे की घंटी, कहीं प्यास न बन जाए त्रासदी… हमें तेलंगाना और महाराष्ट्र से सीखना चाहिए

बिहार में इस साल गर्मी ने अभी अपना प्रचंड रूप दिखाना शुरू ही किया है कि राज्य के 14 जिलों से एक डराने वाली रिपोर्ट सामने आई है। मार्च के महीने में ही इन जिलों का भूजल स्तर 2.5 फीट तक नीचे खिसक गया है। यह गिरावट महज सांख्यिकी नहीं, बल्कि आने वाले भीषण जल संकट की आहट है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सारण और शेखपुरा जैसे जिलों में स्थिति सबसे अधिक नाजुक है, जहाँ पिछले साल के मुकाबले पानी की गहराई में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार का ये संकट गंभीर खतरे की तरफ इशारा करता है। जानिए कि क्यों खाली हो रही है बिहार की ‘जल तिजोरी’?

चार प्रमुख कारण उभरकर सामने आए हैं:

जलवायु परिवर्तन का प्रहार: मानसून के पैटर्न में बदलाव के कारण वर्षा का समय और मात्रा अनिश्चित हो गई है।

दोहन की अंधी दौड़: शहरीकरण और खेती के लिए भूजल का बेहिसाब इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन रिचार्ज (पुनर्भरण) की गति धीमी है।

कंक्रीट का जाल: बढ़ते शहरीकरण ने जमीन को कंक्रीट से ढंक दिया है, जिससे बारिश का पानी जमीन के भीतर नहीं जा पा रहा।

पारंपरिक ढांचों की अनदेखी: पुराने आहर, पाइन और तालाबों के रखरखाव में कमी ने संकट को और बढ़ा दिया है।

खतरे की जद में जीवन और जीविका
भूजल का गिरना केवल प्यास का संकट नहीं है, इसके दुष्प्रभाव बहुआयामी हैं:

सूखते चापाकल: ग्रामीण इलाकों में पेयजल का एकमात्र स्रोत चापाकल हैं। जलस्तर नीचे जाने से ये ‘ड्राय’ हो जाएंगे, जिससे ग्रामीण आबादी को मीलों दूर से पानी लाना होगा।

महंगी होती खेती: सिंचाई के लिए किसानों को अब गहरे बोरिंग और ज्यादा बिजली/डीजल का उपयोग करना होगा, जिससे खेती की लागत बढ़ेगी और फसल उत्पादन प्रभावित होगा।

मिट्टी की गुणवत्ता पर असर: जल स्तर गिरने से मिट्टी की नमी कम होती है, जिससे भविष्य में मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ सकता है।

समाधान: क्या हो आगे की राह?
इस संकट से निपटने के लिए बिहार को तात्कालिक और दीर्घकालिक कदम उठाने होंगे:

जल-जीवन-हरियाली का कड़ाई से पालन: सरकारी योजनाओं को केवल कागजों तक सीमित न रखकर धरातल पर उतारना होगा। हर घर में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संचयन) को जन आंदोलन बनाना होगा।

फसली चक्र में बदलाव: किसानों को उन फसलों की ओर प्रेरित करना होगा जो कम पानी में तैयार होती हैं। ‘ड्रिप सिंचाई’ को व्यापक स्तर पर सब्सिडी के साथ प्रमोट करना जरूरी है।

सीखने लायक उदाहरण: तेलंगाना और महाराष्ट्र का सफल मॉडल
बिहार इस संकट से निपटने के लिए अन्य राज्यों के सफल प्रयोगों को देख सकता है:

तेलंगाना (मिशन काकतीय): तेलंगाना ने अपने हजारों पुराने तालाबों की गाद निकालकर उन्हें पुनर्जीवित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि वहां के कई क्षेत्रों में भूजल स्तर में भारी सुधार देखा गया।

महाराष्ट्र (जलयुक्त शिवार): ‘पानी फाउंडेशन’ जैसे संगठनों और सरकार के सहयोग से महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त गांवों में छोटे-छोटे चेक डैम और जल संरक्षण ढांचों ने चमत्कारिक बदलाव किए हैं।

बिहार के 14 जिलों की यह रिपोर्ट एक ‘अर्ली वार्निंग’ है। यदि आज हम सजग नहीं हुए, तो आने वाले कुछ वर्षों में जल संकट एक सामाजिक और आर्थिक आपदा का रूप ले सकता है।