पश्चिम बंगाल में चुनावी बिगुल बजते ही मतदाता सूची (Voters’ List) और नामांकन प्रक्रिया को लेकर जारी कानूनी लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। अदालत ने एक सख्त संदेश देते हुए कहा है कि बिना गहन जांच के कोई भी नया दस्तावेज स्वीकार नहीं होगा, ताकि फर्जीवाड़े की किसी भी गुंजाइश को खत्म किया जा सके।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, नई दिल्ली
‘आधे घंटे’ का अल्टीमेटम: ट्राइब्यूनल को सक्रिय करने का आदेश
सुनवाई के दौरान जब न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति बिपुल एम पंचोली की पीठ को यह पता चला कि अपीलीय ट्राइब्यूनल (Appellate Tribunal) ने अब तक काम शुरू नहीं किया है, तो कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने आदेश दिया कि आधे घंटे के भीतर ट्राइब्यूनल अपना कामकाज शुरू करे, ताकि नामांकन की अंतिम तिथि (6 अप्रैल) से पहले विवादों का निपटारा हो सके।
152 सीटों पर पैनी नजर और 7 अप्रैल की डेडलाइन
अदालत का मुख्य ध्यान उन 152 सीटों पर है, जहां 23 अप्रैल को पहले चरण का मतदान होना है।
लक्ष्य: 6 अप्रैल (नामांकन की आखिरी तारीख) से पहले सभी तकनीकी और तथ्यात्मक खामियों को दुरुस्त करना।
प्रगति: कलकत्ता हाईकोर्ट की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक लगभग 47 लाख मामलों का निपटारा किया जा चुका है। अदालत ने प्रतिदिन लगभग 2 लाख मामलों की जांच की गति पर संतोष जताया है।
एसआईआर (SIR) विवाद और राजनीतिक गर्माहट
पश्चिम बंगाल में SIR का मामला राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील हो चुका है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को आक्रामक तरीके से उठाते हुए इसे मतदाताओं के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताया है।
अदालत का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने संतुलन बनाते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक का वोट देने का अधिकार बिना ठोस कारण के नहीं छीना जा सकता। यदि किसी का नाम सूची से हटाया जाता है, तो उसका वैध कारण बताना अनिवार्य होगा।
न्यायिक स्वतंत्रता और संसाधन
न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची ने स्पष्ट चेतावनी दी कि न्यायिक अधिकारियों पर किसी भी प्रकार का बाहरी या राजनीतिक दबाव स्वीकार्य नहीं होगा। कोर्ट ने ट्राइब्यूनल के सदस्यों के लिए मानदेय, यात्रा भत्ते और बुनियादी सुविधाओं को तत्काल सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है, ताकि वे बिना किसी बाधा के स्वतंत्र निर्णय ले सकें।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दोतरफा सुरक्षा कवच प्रदान करता है:
मतदाताओं के लिए: यह सुनिश्चित करता है कि वैध मतदाताओं के नाम राजनीतिक द्वेष या तकनीकी गड़बड़ी के कारण सूची से बाहर न हों।
प्रक्रिया के लिए: ‘बिना जांच दस्तावेज स्वीकार न करने’ के नियम से घुसपैठ या फर्जी दस्तावेजों के सहारे मतदाता सूची में सेंध लगाने की कोशिशों पर लगाम लगेगी।
नामांकन से ठीक पहले कोर्ट की यह सक्रियता पश्चिम बंगाल चुनाव में ‘फेयर प्ले’ सुनिश्चित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
































