सरकार ने कहा है, बिहार में सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर लगाम… जानिए इस सुधार में चुनौतियां क्या हैं, क्या ये इतना आसान है?

बिहार सरकार स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक सुधार के लिए एक “क्रांतिकारी” कदम उठाने जा रही है। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हालिया बयान ने राज्य के चिकित्सा जगत में हलचल तेज कर दी है। सरकार का मुख्य उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करना और ‘रेफरल संस्कृति’ को खत्म करना है। हरियाणा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना के मॉडल से हम क्या सीख सकते हैं… ये भी जान लीजिए।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
सरकार केवल प्रतिबंध नहीं लगा रही है, बल्कि डॉक्टरों की आर्थिक क्षति की भरपाई के लिए नॉन-प्रैक्टिस अलाउंस (NPA) और विशेष इंसेंटिव का प्रस्ताव भी रख रही है। इसके साथ ही, सरकारी मेडिकल कॉलेजों के प्रबंधन को निजी हाथों या एक्सपर्ट ग्रुप्स को सौंपने की बात भी कही गई है, ताकि बुनियादी ढांचे का बेहतर उपयोग हो सके।

व्यावहारिक चुनौतियां: ज़मीनी हकीकत का विश्लेषण
इस नीति को लागू करने में सरकार के सामने कई बड़ी बाधाएं आ सकती हैं :-

डॉक्टरों की भारी कमी: बिहार में पहले से ही स्वीकृत पदों के मुकाबले डॉक्टरों की संख्या कम है। पूर्ण प्रतिबंध से कई अनुभवी डॉक्टर सरकारी सेवा छोड़ सकते हैं (VRS ले सकते हैं), जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ेगा।

NPA का वित्तीय बोझ: सभी सरकारी डॉक्टरों को आकर्षक ‘नॉन-प्रैक्टिस अलाउंस’ देना राज्य के खजाने पर बड़ा आर्थिक बोझ डालेगा।

निगरानी तंत्र का अभाव: यह ट्रैक करना बेहद कठिन है कि कोई डॉक्टर अपने घर पर या किसी गुप्त क्लीनिक में मरीज देख रहा है या नहीं। इसके लिए एक सशक्त विजिलेंस सिस्टम की जरूरत होगी।

बुनियादी ढांचे की कमी: यदि डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस छोड़ भी दें, तो क्या सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन थिएटर, डायग्नोस्टिक मशीनें और दवाएं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं? बिना संसाधनों के डॉक्टर केवल अस्पताल में बैठकर भी कुछ खास नहीं कर पाएंगे।

जानिए कि दूसरे राज्यों का इस मामले में क्या अनुभव रहा है
देश के कई राज्यों में यह व्यवस्था पहले से लागू है, जिनसे बिहार सीख ले सकता है:
हरियाणा में पूर्ण प्रतिबंध है। यहां डॉक्टरों को अच्छा वेतन और NPA दिया जाता है। उल्लंघन पर सेवा से बर्खास्तगी तक का प्रावधान है।
पश्चिम बंगाल में व्यवस्था विकल्प आधारित है। यहाँ डॉक्टर NPA ले सकते हैं या उसे त्याग कर प्राइवेट प्रैक्टिस चुन सकते हैं। यह संतुलित मॉडल माना जाता है।
उत्तर प्रदेश में कागजों में प्रतिबंध है। रोक है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसकी निगरानी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
तेलंगाना ने हाल में ही प्रतिबंध लगाया है। 2022 में सरकार ने नए भर्ती होने वाले डॉक्टरों के लिए इसे अनिवार्य किया है, ताकि कानूनी पेच न फंसे।

तो फिर समाधान क्या है
समझना होगा कि केवल प्रतिबंध समाधान नहीं है। सरकार को डॉक्टरों के साथ सार्थक संवाद करना होगा ताकि वे खुद को उपेक्षित महसूस न करें।
सरकारी अस्पतालों में सुरक्षा और बेहतर कार्य वातावरण सुनिश्चित करना होगा।
प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाने के साथ-साथ बायोमेट्रिक अटेंडेंस और रैंडम चेकिंग को सख्ती से लागू करना होगा।