न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। एनडीए के भीतर सीट बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है। इसी बीच गृह मंत्री अमित शाह का 18 और 27 सितंबर का बिहार दौरा बेहद अहम माना जा रहा है। यह दौरा न केवल चुनावी तैयारियों की समीक्षा है, बल्कि विपक्ष, खासकर राहुल गांधी की बिहार में हाल की सक्रियता के जवाब के तौर पर भी देखा जा रहा है। हाल ही में राहुल गांधी ने बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकाली थी और लगभग 15 दिन तक बिहार में लगातार डेरा जमाए रखा। इस दौरान उन्होंने महागठबंधन को धार देने और मतदाताओं के बीच विपक्ष का एजेंडा स्थापित करने की कोशिश की। भाजपा इसे हल्के में नहीं ले रही। शाह का यह दौरा साफ संदेश है कि विपक्ष की इस आक्रामकता का जवाब एनडीए भी उतनी ही ताकत से देगा।
अमित शाह का यह दौरा विपक्ष की बढ़ती सक्रियता और एनडीए की अंदरूनी खींचतान… दोनों का जवाब है। राहुल गांधी ने जहां बिहार में 15 दिन रहकर विपक्ष को धार देने की कोशिश की, वहीं शाह अपने संगठनात्मक कौशल से यह दिखाना चाहते हैं कि एनडीए में नेतृत्व भाजपा के हाथ में है। आने वाले दिनों में सीट शेयरिंग का फार्मूला इसी पृष्ठभूमि में तय होगा।
एनडीए के भीतर की स्थिति
भाजपा-जदयू-लोजपा के बीच सीट बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है। जदयू अपनी पारंपरिक सीटें छोड़ने को तैयार नहीं, जबकि भाजपा 2020 की तुलना में अधिक सीटों पर दावा कर रही है। चिराग पासवान की एलजेपी और अन्य सहयोगी भी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में शाह का दौरा केवल कार्यकर्ताओं को जोश भरने के लिए नहीं, बल्कि गठबंधन में अंतिम फैसले के लिए केंद्र की पकड़ मजबूत करने के लिए भी है।
बैठकों का एजेंडा और राजनीतिक संदेश
18 सितंबर को 2 जोन की बैठक, 27 सितंबर को 3 जोन की बैठक होगी। इन बैठकों में चुनावी तैयारी, विपक्ष की वोटर अधिकार यात्रा का असर और विधानसभा क्षेत्रों में एनडीए की स्थिति पर चर्चा होगी। केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुँचाने की रणनीति बनाई जाएगी। राजनीतिक रूप से यह बैठक भाजपा का पावर शो है। इसका मकसद सहयोगियों को संदेश देना है कि अंतिम निर्णय दिल्ली से ही होगा।
































