न्यूज स्कैन ब्यूरो, सहरसा
लेखक, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञ और मोटिभेटर देवाशीष ने वर्तमान परिस्थिति पर विस्तार पूर्वक स्टीक आकलन किया है।उन्होने कहा कि
लंबे संघर्ष के बाद आठ दशक पहले स्वाधीन हुआ था हिंदुस्तान.. पर दो देशों में विभाजित होकर। आज दशहरा और दिपावली की पावन बेला में मन में ये खयाल आया कि जब आजादी के बाद की यात्रा एक साथ शुरू हुई थी।तो 78 साल में ही, जो एक राष्ट्र-जीवन में बहुत बड़ा कालखंड नहीं होता। दोनों देश इतनी अलग अलग दिशा में कैसे चले गए ? एक देश जो प्रजातंत्र पे डटा रहा यानि सबकी रायशुमारी से चलता रहा, वो विश्व में सबसे ज्यादा जनसंख्या को साथ लेकर भी आज विश्व की तीसरी सबसे बड़ी महाशक्ति बनने के कगार पर है। भाषा, जाति और क्षेत्रवाद के टकराव व अंदरूनी खींचतान एवं आतंकवाद व थोपे गए कई युद्धों के बाहरी खतरों से लड़कर भी आज विश्व में अपनी ऐसी साख बनाई है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के पांचों स्थाई सदस्य आखिरकार उसे छठा स्थाई सदस्य बनाने को लेकर सहमत होते दिख रहे हैं। वहीं दूसरा देश अभी भी अपने नागरिकों को भोजन, शिक्षा, बिजली और बोलने की आज़ादी जैसे मूलभूत सुविधाएं व अधिकार भी उपलब्ध नहीं करा पाया है, आर्थिक स्थिति इतनी लचर हो चुकी है कि वैश्विक अनुदान बंद हो जाए तो पूरा देश दिवालिया हो जाए !आखिर इतनी अलग अलग परिणति क्यों ? गौर से सोचें तो इसके मूल में है दोनों देशों के स्वतंत्रता सेनानियों, राष्ट्र निर्माताओं और शासकों/ सरकारों की सामूहिक सोच का अंतर ।यही विभाजनकारी और स्वार्थी सोच फिर सामाजिक जीवन में भी आई। सामाजिक परिवेश के विचार निर्माताओं ने भी फिर धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्र के नाम पर विभाजनकारी, दमनकारी और धार्मिक कट्टरता वाले विचारों को निजी वर्चस्व बढ़ाने के लिए पोषित किया। नतीजा हुआ बांग्ला बोलने वालों को हिकारत की नज़र से देखना, उनके मानवीय अधिकारों का दशकों तक हनन, मुहाजिरों, बलूचों और अल्पसंख्यकों का दमन, महिलाओं के अधिकारों का हनन और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बना कर रखना और कालांतर में एक सर्वविनाशी ज़िहादी सोच का उदय और उससे उपजा आतंकवाद।दूसरी ओर भारत की स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े नायक ने दक्षिण अफ्रीका से लौटकर पहले देश-भ्रमण किया, जनचेतना को महसूस किया और फिर औजार-रहित अहिंसा को प्रमुख औजार बनाकर जनमानस को तैयार किया आजादी के संघर्ष के लिए। जब आजादी मिली, तब भी न अपने लिए कुछ मांगा, न अपने बंधु-बांधवों को सत्ता के गलियारे के आसपास भी आने दिया। जनमत से चलनेवाले देश में भी यूं तो समस्याएं बनी रहीं पर कम से कम ‘जनता के लिए शासन’ की मूलभूत सोच और “सर्वे भवन्तु सुखिन:” की हमारी संस्कृति ने हर स्तर पर एक भागीदारी और सामूहिकता की सोच को जन्म दिया। सरकारें इधर भी भ्रष्टाचार के व्याधि से पीड़ित रहीं, पर किसी भी प्रशासक की जनता के चमड़े से अपने लिए जूते सिलवाने की हिम्मत न हुई। 18 वर्ष के तरुण देश पर जब एक बार अन्न संकट आया, तो कहते हैं प्रधानमंत्री ने एक बेला खाकर भी देश का स्वाभिमान बचाए रखने की अपील की, पर प्रयासों में सामूहिकता बनी रही।
इसलिए निजी व्यवसाय और उद्योग अपनी दक्षता और व्यापारिक कौशल से पनपे और सुदृढ़ हुए और आज देश की अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। देश का संस्थागत ढांचा बनाने और शिक्षा पर जोर देने की सोच का परिणाम ये हुआ कि नब्बे का दशक आते आते, तकनीकी रूप से सुशिक्षित भारतीयों ने कंप्यूटरीकरण के दौर में विश्व भर में ऐसी पैठ बनाई कि 21वीं शताब्दी में ज्ञान और तकनीकी कौशल के जुड़े कंप्यूटर, डिजिटल, रक्षा अनुसंधान व उपकरण, औषधि और स्वास्थ्य आदि व्यवसायों में भारतीय अग्रणी भूमिकाओं में अपनी स्थिति और मज़बूत करते नज़र आयेंगे।
इसी तरह निज स्वार्थ में रची बसी सत्ताभोगी सोच के बिल्कुल उलट धीरे धीरे इस देश में कर्मनिष्ठा, संपूर्ण समर्पण और पूरे देश और समाज को अपना परिवार समझने वाली नेतृत्व क्षमता के भी कई उदाहरण देखने को मिले। अब्दुल कलाम सर इनमें से एक थे और मेरा सौभाग्य है कि उनसे मिलने का मुझे अवसर मिला।आगे भी सामाजिक जीवन में हमें सबको साथ लेकर चलनेवाले, सबकी राय को महत्व देनेवाले नायक ही चाहिए होंगे, तभी सामूहिक हित और भागीदारी की सोच जो अब तक कारगर रही है भारत को आगे ले जाने में, वही आगे भी स्वर्णिम परिणाम देती रहेगी। निज अधिकार की भावना से ग्रसित लोग या समाज अपना और अपने परिवेश का भी गलत मूल्यांकन करते हैं और किस तरह पूरे समाज व देश को रसातल में जाते हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे पड़ोस में है, सो हम सभ सचेत रहें निज स्वार्थ की क्षुद्र पूर्ति में लगे लोगों से और देश, समाज और परिवेश की प्रगति में ही अपनी सार्थकता समझने वालों को आगे लाएं, उनका खुलकर समर्थन करें।



























