खगड़िया की छह में छह सीटें एनडीए के खाते में, सांसद राजेश वर्मा की रणनीति और मेहनत बनी जीत की कुंजी

न्यूज स्कैन ब्यूरो, खगड़िया
बिहार विधानसभा चुनाव में खगड़िया जिले ने इस बार इतिहास रच दिया। जिले की चार और लोस क्षेत्र की छह विधानसभा सीटें, खगड़िया, बेलदौर, परबत्ता, अलौली, हसनपुर और सिमरीबख्तियारपुर पूरी तरह एनडीए के खाते में चली गईं। यह नतीजा सिर्फ संगठनात्मक मजबूती का संकेत नहीं है, बल्कि खगड़िया के सांसद राजेश वर्मा की सक्रियता, लगातार फील्डिंग और बूथ-स्तर पर किये गए सटीक माइक्रो मैनेजमेंट का भी प्रमाण है।
चुनाव के ठीक पहले से सांसद ने पूरे जिले में लगातार दौरे बढ़ा दिए थे। गली–मोहल्ले से लेकर पंचायत स्तर तक बैठकों का सिलसिला तेज कर दिया था। सांसद ने लोगों से वादा किया था कि एनडीए की प्राथमिकता में किसानी, आवागमन, बाढ़ राहत, पुल–सड़क जैसे मुद्दे हैं। इसके साथ ही संगठन के कार्यकर्ताओं को “प्रति बूथ, प्रति वोट” की स्पष्ट जिम्मेदारी दी। यह लगातार मौजूदगी मतदाताओं को सीधा संदेश देती रही कि एनडीए केवल चुनाव में नहीं, हर वक्त जनता के बीच मौजूद है।
वहीं विपक्ष इलाके में एकजुट रणनीति बनाने में विफल दिखा, वहीं एनडीए की टीम ने संयुक्त सभाएँ, आपसी समन्वय और जातीय–स्थानीय संतुलन पर आधारित उम्मीदवार चयन को पूरी तरह फोकस में रखा। सांसद राजेश वर्मा ने कहा, यह जनता की जीत है। जनता के उम्मीदों की जीत है, उनकी जरूरतों की जीत है। शुरू से ही खगड़िया की तमाम विधानसभाओं में एकतरफा लड़ाई रही। ज्ञात हो कि सांसद ने काफी कम समय में सड़क, पुल निर्माण, स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार,शिक्षा और रेल–सड़क संपर्क जैसे मोर्चों पर बेहतर नतीजे के साथ काम किया है। सांसद ने इन विकास कार्यों के जरिए अपनी विश्वसनीयता मजबूत की, जिसका सीधा फायदा वोटों में नजर आया। खगड़िया जिले की तमाम विधानसभाओं में सांसद राजेश वर्मा ने जी तोड़ मेहनत की। हर गांव में खुद उम्मीदवार के साथ गए और चुनावी पंपलेट भी अपने हाथों से बांटा और उम्मीदवार के लिए वोट मांगा। उनके सौम्य और सरल स्वभाव को आम लोग पहले से पसंद कर रहे थे। मैदान में उनके आने के बाद मुकाबला एकतरफा हो गया और खगड़िया जिले के चारों विधानसभा में एनडीए गठबंधन के उम्मीदवारों ने क्लीन स्विप जीत हासिल की।

जानिए किस क्षेत्र में कितने मत से जीते और पीछे की क्या रही कहानी

1- बबलू कुमार मंडल – खगड़िया सदर – 23415 वोट से जीते, इन्हें कुल 93988 मत प्राप्त हुए। वहीं इनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी डॉक्टर चंदन यादव को 70573 मत प्राप्त हुए।

  • कांग्रेस के उम्मीदवार के हार के कारण : खगड़िया सदर से चुनावी मैदान में हाथ आजमा रहे डॉक्टर चंदन यादव के हार के वैसे तो कई कारण हैं लेकिन उनमें से प्रमुख कारण भितरघात है। उल्लेखनीय है कि उन्होंने इसके पूर्व उन्होंने बेलदौर से चुनाव लड़ा था। वहां भी उन्हें लगभग 5 हजार वोट हार का सामना करना पड़ा था। तब भी उन्होंने पार्टी के साथियों को साथ लेकर चुनाव नहीं लड़ा था। इस वजह से पार्टी के कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश था। इस बार खगड़िया में भी उन्होंने स्थानीय लोगों का साथ नहीं लिया। जिस वजह से कार्यकर्ताओं में असंतोष की भावना दोगुनी हो गई थी। राजद के कोई भी कार्यकर्ता उनके साथ तन्मयता और उत्साह के साथ प्रचार करते नजर नहीं आए। यहीं से उनकी हार के पटकथा लिखी जाने लगी और उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

2- पन्ना लाल पटेल – बेलदौर – 35175 वोट से जीते। इन्हें कुल 106262 मत प्राप्त हुए। जबकि इनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के उम्मीदवार मिथिलेश निषाद को 71087 मत प्राप्त हुए।

  • कांग्रेस के उम्मीदवार मिथिलेश निषाद के हार का प्रमुख कारण यहां महागठबंधन के अंदर हुई टूट रही। एक तरफ कांग्रेस ने यहां से मिथिलेश निषाद को टिकट दिया और दूसरी तरफ से आईपी गुप्ता की पार्टी ने तनीषा चौहान को अपना उम्मीदवार बना दिया। इस विधानसभा में कौन महागठबंधन का उम्मीदवार रहा यही समझने और समझाने में नेताओं के दिन निकल गए और दोनों ही उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा।

3- रामचंद्र सदा – अलौली – 35732 वोट से जीते, प्राप्त कुल मत – 93208। निकटतम प्रतिद्वंद्वी आरजेडी के रामवृक्ष सदा को 57476 मत मिले।

  • आरजेडी के उम्मीदवार रामवृक्ष सदा का अलौली में भरी आंतरिक विरोध था। इनकी भाषा से लोग पहले से नाराज थे। लोगों को आरजेडी की तरफ उम्मीदवार के बदले जाने की उम्मीद थी। चुनाव से ठीक पहले आरजेडी के कोर वोटर को लेकर वायरल एक ऑडियो ने रही सही कसर भी निकाल दी। इसी वजह से उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

4- बाबू लाल शौर्य – परबत्ता -34039 वोट से चुनाव जीते। इन्हें कुल 118677 मत प्राप्त हुआ। जबकि इनके निकटतम आरजेडी के उम्मीदवार डॉक्टर संजीव कुमार को कुल 84638 मत प्राप्त हुए।

  • आरजेडी के डॉक्टर संजीव कुमार परबत्ता से बहुत मजबूत उम्मीदवार के रूप में देखे जा रहे थे। लेकिन उनके कार्य के तौर तरीके को लेकर परबत्ता में काफी असंतोष व्याप्त था। भाषाई मर्यादा तोड़ने के कारण वे लगातार हाशिए पर जा रहे थे। चुनाव में हर कदम फूंक कर रखने वाले डॉ. संजीव आत्मविश्वास से इतने लबरेज थे कि उन्हें अपनी चूक नजर ही नहीं आ रही थी।