पूर्व सीएम भागवत झा आजाद, शिवचंद्र झा, सदानंद सिंह की धरती हुई वीरान: कांग्रेस का आख़िरी किला भागलपुर भी ढहा

प्रदीप विद्रोही, भागलपुर

माफिया किलर मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद, शिवचंद्र झा और सदानंद सिंह की तेज से कभी उर्वरा रही धरती भागलपुर अब कांग्रेस-विहीन हो गई। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस के इकलौते विधायक अजीत शर्मा भी चारों खाने चित हो गए। जीत का ‘चौका’ लगाने की उनकी इच्छा को भाजपा की चौतरफा घेराबंदी ने धूल-धूसरित कर दिया। भाजपा प्रत्याशी रोहित पांडे ने दूसरे प्रयास में अजीत शर्मा को पराजित कर दिया। कहा जाता है कि भागलपुर में कांग्रेस की लगातार गिरती साख, हैवीवेट नेता सदानंद सिंह के निधन के बाद ही कमजोर पड़ने लगी थी।

कांग्रेस के दिग्गज नेता स्वर्गीय सदानंद सिंह के निधन के बाद भागलपुर की सियासत में पार्टी की पकड़ लगातार ढीली होती गई। हालात इतने बदल गए कि जहाँ कभी कांग्रेस का झंडा बुलंद रहता था, वहीं इस चुनाव में उसकी बची – खुची साख भी धराशायी हो गई। भागलपुर सदर की वह सीट, जिसे कांग्रेस की प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था, भाजपा के हाथों निकल गई। हैट्रिक के बाद ‘चौका’ लगाने निकले अजीत शर्मा इस बार पिच पर टिक नहीं पाए और भाजपा प्रत्याशी रोहित पांडे ने धमाकेदार अंदाज़ में जीत दर्ज की।

भाजपा ने यह विजय यूं ही हासिल नहीं की। पटना से लेकर दिल्ली तक पूरा नेतृत्व मैदान में उतरा। बागियों को मनाना पड़ा, नाराज़ नेताओं को साधना पड़ा और कई पूर्व केंद्रीय मंत्रियों को ‘आश्वासन की गठरी’ देकर संतुष्ट करना पड़ा। लंबी किल्लत के बाद अंततः भाजपा ने यह रणनीतिक जीत दर्ज की।

फ्रेंडली फाइट में कांग्रेस साफ़, कहलगांव – सुल्तानगंज से लगा करारा झटका

कहलगांव और सुल्तानगंज की तथाकथित ‘फ्रेंडली फाइट’ ने कांग्रेस को सीधे शून्य पर ला खड़ा किया। कहलगांव में प्रवीण सिंह कुशवाहा ने खुद को ‘कहलगांव का बेटा’ बताकर चुनावी मैदान में बादशाहत पाने की कोशिश की, पर न सदानंद सिंह का उत्तराधिकारी होने का दावा काम आया, न ही स्थानीय भावनाएं उमड़ पाईं। वे मात्र 10,083 वोट पाकर चौथे स्थान पर सिमट गए।

इस मुकाबले में आरजेडी के रजनीश दूसरे स्थान पर रहे, पर सदानंद सिंह के पुत्र और जेडीयू प्रत्याशी शुभानंद मुकेश ने उन्हें 50 हजार से अधिक वोटों से पराजित कर दिया। गौरतलब है कि यही वह सीट है जहाँ सदानंद सिंह नौ बार कांग्रेस विधायक रहे थे। पिता के राजनीति से संन्यास की घोषणा के बाद 2020 में कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ने वाले शुभानंद मुकेश हार गए थे, लेकिन पिता के निधन के बाद राजनीतिक समीकरण बदल गए। जेडीयू में शामिल होते ही उन्होंने भारी बहुमत से जीत दर्ज की। यह संकेत था कि ‘सदानंदी वोट’ सदानंद के बेटे मुकेश के साथ ही रहे। इसके साथ ‘पांच पांडव’ और उनकी पूरी टीम का समर्थन भी मुकेश के साथ खड़ा रहा।

सुल्तानगंज में भी ‘फ्रेंडली’ से हुई फजीहत

सुल्तानगंज में कांग्रेस की हालत और भी खराब रही। 2020 में कांग्रेस को मिले 61,218 वोट इस बार आरजेडी प्रत्याशी चंदन कुमार सिन्हा की झोली में चले गए, जिन्हें 77,576 वोट मिले। कांग्रेस मैदान में कहीं दिखाई ही नहीं दी। इस सीट पर जेडीयू के प्रोफेसर ललित नारायण मंडल ने शान से जीत दर्ज की। कांग्रेस के ललन कुमार तीसरे स्थान पर रहे, जिन्हें मात्र 2,754 वोट मिले।

सदानंद युग के बाद कांग्रेस खाली हाथ

भागलपुर के राजनीतिक नक्शे पर कांग्रेस अब लगभग इतिहास बनकर रह गई है। सदानंद सिंह के रहते जो साख, पकड़ और जनाधार कायम था, वह उनके जाने के बाद तेज़ी से बिखर गया। इस बार अजीत शर्मा की हार के बाद तो कांग्रेस का नामोनिशान ही भागलपुर से मिट गया। भागलपुर, कहलगांव और सुल्तानगंज तीनों मोर्चों पर कांग्रेस की करारी पराजय ने साफ़ कर दिया कि पार्टी अब यहां पुनर्जीवन की कठिन राह पर है।