मदन, भागलपुर
बिहार के बहुचर्चित सृजन महाघोटाले में आठ साल बाद पहली बार किसी केस में अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए तीन आरोपितों को सजा सुनाई है। इस मामले में अमरेन्द्र यादव और अजय पांडेय को चार-चार साल की सजा, जबकि राकेश कुमार को तीन साल की सज़ा सुनाई गई है। आरोप था कि इन तीनों ने सरकारी विभागों की राशि सरकारी खातों में भेजने के बजाय सृजन महिला विकास सहयोग समिति के खातों में ट्रांसफर कराई थी।
ग़ौरतलब है कि इस घोटाले में 12 से अधिक सरकारी विभागों की धनराशि में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई थी।


सृजन घोटाला फिर सुर्खियों में — मुख्य आरोपी रजनी प्रिया गिरफ्तार
भागलपुर जिले का कुख्यात सृजन घोटाला एक बार फिर चर्चा में है। इस बीच घोटाले की मुख्य आरोपित रजनी प्रिया, जो सृजन संस्था की सचिव थी, को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया है।
इस घोटाले की पहली एफआईआर भागलपुर के विभिन्न थानों में 7 अगस्त 2017 को दर्ज हुई थी। उसी समय पहली बार यह खुलासा हुआ कि कई सरकारी विभागों के खातों से करोड़ों रुपये अवैध रूप से सृजन संस्था के खातों में ट्रांसफर किए जा रहे थे।
जांच में सामने आया कि सबसे बड़ा घोटाला जिला भू-अर्जन विभाग में हुआ, जहां 270 करोड़ रुपये सृजन के खाते में भेज दिए गए। अवैध लेन-देन मुख्य रूप से बैंक ऑफ बड़ौदा और इंडियन बैंक की भागलपुर शाखाओं के माध्यम से किया गया था।
कैसे होता था करोड़ों का खेल? — घोटाले का तरीका
सृजन महिला विकास सहयोग समिति की संस्थापक मनोरमा देवी और उनके सहयोगियों ने अत्यंत सुनियोजित तरीके से सरकारी धन को अपने खातों में मोड़ने की रणनीति बनाई।
सरकारी विभाग द्वारा जारी बैंकर्स चेक या सामान्य चेक के पीछे
सृजन संस्था की मुहर लगाई जाती थी, जिस पर मनोरमा देवी हस्ताक्षर कर देती थीं। इसके बाद चेक का भुगतान सीधे सृजन के खातों में हो जाता था।
विभागीय अधिकारियों को जब खाते की विवरणी चाहिए होती, तो उन्हें फर्जी प्रिंटर से तैयार की गई नकली बैंक स्टेटमेंट दे दी जाती थी। इस वजह से विभागीय ऑडिट भी सालों तक इस अवैध निकासी का पता नहीं लगा पाया।
सृजन संस्था: महिला विकास के नाम पर चल रहा था भ्रष्टाचार का अड्डा
सृजन महिला विकास सहयोग समिति वर्ष 1996 में सहकारिता विभाग में पंजीकृत हुई थी। इसका उद्देश्य था: महिलाओं को स्वरोजगार उपलब्ध कराना
स्वयं सहायता समूह बनाकर आर्थिक मजबूती देना
उत्पादों को बाजार से जोड़ना। जरूरत पड़ने पर महिला समूहों को ऋण देना। मनोरमा देवी ने महज़ दो महिलाओं के साथ संस्था की शुरुआत की थी। बाद में संस्था में करीब 6000 महिलाएँ और 600 स्वयं सहायता समूह जुड़ गए। कहानी बदलने का मोड़ वर्ष 2003 में आया, जब सरकारी धन पर संस्था की नजर पड़ी और घोटाले की शुरुआत हुई। मनोरमा देवी ने अपने बेटे और बहू रजनी प्रिया को भी संस्था में महत्वपूर्ण पद दिए। रजनी प्रिया सचिव बनी और घोटाले में गहरी भूमिका निभाई।
घोटाले की अंदरूनी कहानी — 14 साल तक चलती रही लूट
सृजन घोटाले की जड़ें 16 दिसंबर 2003 तक जाती हैं। लगभग 14 वर्षों तक विभिन्न विभागों की राशि लगातार सृजन के खातों में भेजी जाती रही और किसी को भनक तक नहीं लगी।
कब और कहां हुआ घोटाला?
प्राथमिकियों से पता चलता है कि सृजन के निशाने पर क्रमशः ये विभाग आए—
- 2003–2017 : नजारत शाखा
सबसे पहले घोटालेबाजों ने जिला प्रशासन की नजारत शाखा के फंड की “सफाई” शुरू की। वर्षों तक करोड़ों रुपये ट्रांसफर होते रहे। - 2007 : दंगा पीड़ित पेंशन और उर्दू छात्रों की प्रोत्साहन राशि
दंगा पीड़ितों को मिलने वाली पेंशन
उर्दू भाषी विद्यार्थियों को मिलने वाली छात्र प्रोत्साहन राशि
दोनों को सृजन ने हड़प लिया। - सहकारिता बैंक
किसानों की जमा-पूंजी भी सृजन तक पहुँचाई जाती रही और किसी को पता नहीं चला। - 2013 : जिला परिषद योजनाएँ
जिला परिषद की योजना राशि सृजन के खाते में ट्रांसफर होने लगी, जिससे कई विकास कार्य अधर में रह गए। - सहरसा भू-अर्जन (2013–2017)
सृजन ने अपना दायरा बढ़ाते हुए दूसरे जिलों तक हाथ बढ़ाया। सहरसा में भी बड़ी लूट की गई। - भागलपुर भू-अर्जन, नगर विकास, ग्रामीण विकास, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य विभाग
अंतिम वर्षों में घोटालेबाजों ने लगभग हर उस विभाग को निशाना बनाया, जहाँ बड़ी राशि का प्रवाह था।
घोटाले के खुलासे के बाद
2017 में मामला उजागर होने के बाद:
राज्य सरकार ने घोटाले की जांच CBI को सौंपी
दर्जनों अधिकारी, बैंककर्मी और सृजन से जुड़े लोग आरोपित बने। करोड़ों की राशि की बरामदगी और संपत्तियों की कुर्की शुरू हुई।
हाल की कार्रवाई में मुख्य आरोपी रजनी प्रिया की गिरफ्तारी और अब पहली बार अदालत से सजा — जिससे पीड़ितों को न्याय की उम्मीद जगी है।
नतीजों के बाद घोटाले पर कसा शिकंजा
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद अदालत ने जिस तेजी से इस मामले की सुनवाई की, उससे लंबे समय से लंबित इस घोटाले में नई कानूनी सक्रियता दिखाई देती है। आठ साल बाद मिली पहली सजा ने इस महाघोटाले को फिर सुर्खियों में ला दिया है।



























