न्यूज स्कैन ब्यूरो, सुपौल
धर्मशास्त्र अनुसार कामना पूर्ति हेतु कितने आवृत्ति पाठ करनी चाहिए तथा उससे किन-किन फलों की प्राप्ति होती है इसके महत्व पर प्रकाश डालते हुए गोसपुर ग्राम निवासी पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि, नवग्रह को शांत करने के लिए दुर्गा सप्तशती की पांच आवृत्ति पाठ करना चाहिए। इस प्रकार महान से महान भय उपस्थित होने पर सात आवृत्ति दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए ।शत्रुओं के उपद्रव अत्यधिक होने की स्थिति में तथा अपने अभिलाषा पूर्ति हेतु 12 आवृत्ति पाठ करनी चाहिए। शत्रु को वस में एवं नारी वस्वर्ती के लिए 14 आवृत्ति पाठ करना चाहिए ।सुख तथा समृद्धि हेतु 15 आवृत्ति, पुत्र पौत्र ,धन-धान्य, के लिए 16 आवृत्ति, राज्य एवं समस्त प्रकार के भय से मुक्ति हेतु 17 आवृत्ति पाठ करना चाहिए। दुश्मनों के उच्चाटन हेतु 18 आवृत्ति, कैंसर टीवी आदि रोगों से मुक्ति हेतु 20 आवृत्ति तथा जेल से छुटकारा पाने हेतु 25 आवृत्ति दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए। किसी प्रकार की मुसीबत आने पर या इलाज बिगड़ जाने पर या जातीय विनाश के अवसर पर दुश्मन और रोगों के बढ़ जाने पर धन के घट जाने पर दैहिक दैविक भौतिक ताप होने पर अतिशय पाप लगने पर प्रयास पूर्वक 100 आवृत्ति पाठ करना चाहिए। दुर्गा सप्तशती के 100 आवृत्ति पाठ करने वाले के लिए लक्ष्मी एवं राज की वृद्धि होती है। 108 आवृत्ति के पाठ करने वालों के लिए वाक् सिद्धि एवं 100 अस्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है। एवं एकहजार आवृत्ति पाठ करने वाले को लक्ष्मी स्वयं आकर वरन करती है तथा उनके घर में स्थिर हो जाती है। उसका हर मनोरथ पूर्ण होता है और अंत में उसे संसार से माया से मुक्ति मिलती है। जिस प्रकार यज्ञों का राजा अश्वमेध यज्ञ होता है, देवताओं का राजा भगवान विष्णु , इसी तरह स्तोत्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्त्रोत दुर्गा सप्तशती है। अतः सभी भक्तो को श्री दुर्गा सप्तशती का विधिवत पाठ अवश्य करना चाहिए।


























