न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार की राजनीति में शराबबंदी एक ऐसा मुद्दा है जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष अक्सर एक-दूसरे को घेरते रहे हैं। लेकिन जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने न केवल बिहार से शराबबंदी खत्म करने की वकालत की है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार (NDA) को चुनौती देते हुए कहा है कि अगर यह मॉडल इतना ही सफल है, तो इसे पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए।
आज नहीं तो कल, शराबबंदी हटेगी
प्रशांत किशोर ने अपने जन सुराज अभियान के दौरान साफ किया कि बिहार में लागू वर्तमान शराबबंदी कानून पूरी तरह विफल हो चुका है। पीके का तर्क है कि बिहार में शराबबंदी केवल कागजों पर है। धरातल पर शराब की ‘होम डिलीवरी’ हो रही है और एक समानांतर अवैध अर्थव्यवस्था (Parallel Economy) खड़ी हो गई है। उन्होंने भविष्यवाणी की कि यह कानून ज्यादा दिनों तक नहीं टिकेगा और आज नहीं तो कल इसे हटाना ही पड़ेगा।
केंद्र सरकार को चुनौती: पूरे देश में लागू हो मॉडल
प्रशांत किशोर ने शराबबंदी को महिलाओं के फायदे से जोड़ने के दावों पर तंज कसते हुए कहा,:”अगर नीतीश कुमार और एनडीए का यह मानना है कि शराबबंदी से वाकई महिलाओं को फायदा हो रहा है और समाज सुधर रहा है, तो फिर भाजपा की केंद्र सरकार इसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश या पूरे देश में लागू क्यों नहीं करती? अगर यह इतना ही बेहतर मॉडल है, तो इसे सिर्फ बिहार तक ही सीमित क्यों रखा गया है?”
आर्थिक नुकसान और शिक्षा का बजट
प्रशांत किशोर ने शराबबंदी के आर्थिक पहलुओं पर प्रहार करते हुए एक बड़ा विजन साझा किया है। पीके के अनुसार, शराबबंदी के कारण बिहार सरकार को हर साल लगभग 20,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। उनका तर्क है कि शराबबंदी हटाने के बाद मिलने पूरे राजस्व (Tax) को बिहार की शिक्षा व्यवस्था सुधारने और विश्वस्तरीय स्कूल-कॉलेज बनाने में खर्च किया जा सकता है। प्रशांत किशोर का तर्क है कि शराबबंदी से भ्रष्टाचार बढ़ा है। इससे पुलिस और माफिया के बीच एक नया ‘नेक्सस’ पैदा हुआ है। इस कानून ने हजारों लोगों को अपराधी बना दिया, जबकि राजस्व का नुकसान विकास को रोक रहा है। एनडीए का बिहार में समर्थन और अन्य राज्यों में विरोध उनकी कथनी और करनी में अंतर दिखाता है।


























