अबकी बार, बच्चों की सरकार! समवेत संस्था ने उम्मीदवारों को थमाया ‘बाल अधिकार घोषणा पत्र’

प्रदीप विद्रोही, भागलपुर

इस बार चुनावी मैदान में सिर्फ नेता नहीं, बच्चे भी अपनी बात कह रहे हैं – बस फर्क इतना कि उनके हाथ में माइक नहीं, घोषणा पत्र है। समवेत संस्था ने विधानसभा चुनाव 2025 के बीच बच्चों के अधिकारों को राजनीति के एजेंडे में लाने की एक अनोखी पहल की है। संस्था ने अपने किशोर समूहों और सहयोगी संगठनों के साथ मिलकर बच्चों की आवाज़ को सियासत के कानों तक पहुंचने का बीड़ा उठाया है।

बच्चों का घोषणापत्र – नेताओं के लिए एक नया ‘होमवर्क’

बिहार के विभिन्न जिलों के बच्चों ने मिलकर एक ऐसा ‘बाल अधिकार घोषणा पत्र’ तैयार किया है, जो नेताओं को याद दिलाता है कि सड़क, पुल और बिजली के साथ-साथ स्कूल, सुरक्षा और समान अवसर भी ज़रूरी हैं। इस घोषणा पत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, बाल विवाह, बाल श्रम, पर्यावरण, डिजिटल शिक्षा तक पहुंच, और बालिकाओं की भागीदारी जैसे अहम मुद्दों को जगह दी गई है। मतलब – इस बार बच्चे खुद बता रहे हैं कि ‘हमारे सपनों का बिहार कैसा हो।’

नेताओं से मुलाकात, वादों की याद दिलाई

समवेत की टीम और किशोरी समूहों ने भागलपुर, कहलगांव और बिहपुर विधानसभा क्षेत्रों में विभिन्न प्रत्याशियों से मुलाकात की। उन्होंने नेताओं को यह घोषणा पत्र सौंपते हुए कहा – ‘हम वोट नहीं दे सकते, लेकिन हमारी ज़िंदगी आपके वादों पर टिकी है।’
महागठबंधन, एनडीए और निर्दलीय उम्मीदवार – सभी से अपील की गई कि वे अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्रों में बच्चों से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता दें।

‘बच्चे मतदाता नहीं, भविष्य हैं’ – समवेत निदेशक

इस अवसर पर समवेत संस्था के निदेशक श्री बिक्रम ने कहा, ‘बच्चे केवल कल के मतदाता नहीं, आज के नागरिक भी हैं। अगर राजनीति में उनके अधिकारों की बात नहीं होगी, तो विकास अधूरा रहेगा।’उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि वे अपने घोषणा पत्रों में बाल अधिकारों को स्पष्ट रूप से स्थान दें, ताकि बिहार सच में ‘बाल अनुकूल राज्य’ बन सके।

संदेश साफ़ है – इस बार चुनावी हवा में सिर्फ जाति और विकास की बातें नहीं, बच्चों के सपनों की खुशबू भी घुली है। कह सकते हैं – ‘जहां हर बच्चा सुरक्षित, शिक्षित और सम्मानित होगा – वही असली बिहार बनेगा।’