बिहार में सुधार के क्रांतिकारी कार्यों के लिए हमेशा नीतीश को याद किया जाएगा – आलोक अग्रवाल

आख़िरकार नीतीश कुमार ने खुद ही राज्यसभा जाने की अपनी मंशा जाहिर करके सारी अटकलों पर विराम लगा दिया। इसके साथ ही बिहार में उनके लगभग पच्चीस साल लंबे शासन का पर्दा गिरने जा रहा है—भले ही यह शासन अक्सर राजनीतिक पाला बदलने के साथ चलता रहा हो। इतना कि कम उदार आलोचक इसे मजाकिया अंदाज़ में कहते रहे कि बिहार में सरकारें बदलती हैं, मुख्यमंत्री नहीं!

नीतीश कुमार को निश्चित रूप से इस बात के लिए याद किया जाएगा कि उन्होंने बिहार को जंगलराज से बाहर निकालने की कोशिश की। उनका पहला कार्यकाल कुछ ऐसा था, जैसा हर बिहारी सपना देखता था। उन्होंने बिहार में कई सामाजिक और विकास संबंधी सुधारों की शुरुआत की—शराबबंदी, जीविका दीदियों का सशक्तिकरण, छात्राओं के लिए साइकिल योजना, सड़क ढांचे का विस्तार, स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार और कई अन्य पहलें भी।

साथ ही उन्हें उन कई अवसरों के लिए भी याद किया जाएगा, जो हाथ से निकल गए। एक तकनीक-समझ रखने वाले राजनेता के नेतृत्व में बिहार और क्या हासिल कर सकता था—यह सवाल उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि वह जो वास्तव में हासिल हुआ। उनका कद, उनके गठबंधन, राष्ट्रीय स्तर पर सत्ताधारी दलों के साथ उनका प्रभाव और शुरुआत में दिखाई गई उनकी दृष्टि—इन सबने अक्सर यह एहसास कराया कि इससे कहीं अधिक हासिल किया जा सकता था।

लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए उन्होंने ज़्यादा भरोसा जातीय गणित, गठबंधन की जटिल राजनीति और बीते दौर के डर को जीवित रखने पर किया। ‘कोई विकल्प नहीं’ यानी TINA factor और महिला मतदाताओं का समर्थन उन्हें सत्ता में बनाए रखने में अहम रहा, भले ही घोड़े यानी सहयोगी दल बार-बार बदलते रहे। अंततः उनके शासन को याद करते समय अधूरे वादों, अनछुए संभावनाओं और उस प्रयास की कमी की एक हल्की कड़वाहट भी साथ रहेगी, जो बिहार को पूरी तरह बदल सकता था।

पिछले कुछ समय से उनके भाषण, उनकी शैली और उनके फैसले लगातार जांच और मजाक का विषय बनते रहे—कुछ मामलों में सवाल भी उठे। तरह-तरह की साजिशों की कहानियां भी सामने आईं, कुछ लोगों ने कहा कि उनका संतुलन डगमगा रहा है। जो भी हो, और इसके साथ ही Bharatiya Janata Party की महत्वाकांक्षाएं भी खुलकर सामने आने लगीं—यह साफ होता जा रहा था कि मुख्यमंत्री के रूप में उनके दिन अब गिने-चुने रह गए हैं।

उनके नेतृत्व में बनी नई सरकार विकास और औद्योगीकरण को लेकर सही बातें करती नजर आई, और भाजपा के दोनों उपमुख्यमंत्री भी मुख्यमंत्री की कुर्सी की दौड़ में सक्रिय दिखाई दिए—जब भी यह पद खाली होता।

अब मुख्यमंत्री की कुर्सी किसे मिलेगी, यह करोड़ों का सवाल है। लंबे अंतराल के बाद अब यह लगभग तय है कि बिहार में किसी राष्ट्रीय दल—यानी Bharatiya Janata Party—का मुख्यमंत्री देखने को मिल सकता है। अब यह Narendra Modi और Amit Shah के नेतृत्व पर निर्भर करेगा कि वे बिहार के लिए अपनी असली मंशा क्या दिखाते हैं—क्या वे वास्तविक विकास के लिए मुख्यमंत्री देंगे, या फिर सत्ता को हर हाल में बनाए रखने के लिए जातीय गणित के हिसाब से चेहरा चुनेंगे?

संभावना यही है कि आने वाले वर्षों में Nishant Kumar, Tejashwi Yadav और Chirag Paswan के साथ बिहार की राजनीति के नए झंडाबरदारों की कतार में दिखाई देंगे। साथ ही Nitin Nabin को भी नहीं भूलना चाहिए, जिन्हें भाजपा ने राष्ट्रीय मंच पर आगे बढ़ाया है।

राज्य की राजनीति से नीतीश के बाहर होने से विपक्ष को भी एक वास्तविक मौका मिलेगा कि वह खुद को संगठित कर सके। होली की भांग का असर अभी पूरी तरह उतरा भी नहीं है, लेकिन जनता की निगाहें आगे की राजनीतिक पटकथा पर टिकी हैं। यह सियासी नाटक अपने आप में नशे जैसा है, और बसंती हवा मानो छेड़ते हुए कह रही हो—
आइए न हमारे बिहार में!
(आलोक अग्रवाल, अध्यक्ष, क्रेडाई भागलपुर तथा उपाध्यक्ष, ईस्टर्न बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन)