आध्यात्मिक क्रांति का पर्व है मकर संक्रांति – आचार्य धर्मेंद्रनाथ

न्यूज स्कैन ब्यूरो, सुपौल

भ्रम में नहीं रहे इस वर्ष भी 14 जनवरी को ही होगा मकर संक्रांति।प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व संपूर्ण भारतवर्ष में पूर्ण हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। संक्रांति का अर्थ होता है संक्रमण ।वह जिस काल समय में हो अर्थात इस बार मकर संक्रांति का पुण्य काल दिनांक 14 जनवरी 2026 को 12 बजे से लेकर संध्या काल 5 बजकर 15 मिनट तक सूर्यास्त तक संक्रांति का पुण्य काल है। मकर संक्रांति सुख ,शांति, वैभव, प्रगति सूचक, जीवो में प्राण दाता, स्वास्थ्य वर्धक, औषधियों के लिए गुणकारी, सिद्धिदायक और आयुर्वेद के लिए विशेष महत्व की है। जिस काल में संक्रांति है उससे 16 घड़ी पहले और 16 घड़ी बाद पुण्य काल मानते हैं। परंतु मकर संक्रांति को विशेष महत्व देने के कारण 40 घड़ी बाद तक पुण्य काल होता है ।यह कहना है गोसपुर निवासी मिथिला विभूति व मिथिला रत्न सम्मान से सम्मानित पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र का। उन्होंने मकर संक्रांति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, जब सूर्य देव एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश – संक्रमण करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं। मकर संक्रांति इस मायने में अति महत्वपूर्ण है कि इस समय सूर्य देव ऐसी कोण पर आ जाते हैं जब वह संपूर्ण रश्मियों को मानव पर प्रकाशित करते हैं। इस आध्यात्मिक तत्व को ग्रहण करने के लिए साधक को चैतन्य होना आवश्यक होता है। मकर संक्रांति को सूर्य साधना का पर्व माना जाता है। सूर्य प्रत्येक राशि पर एक महीना तक संचार करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक माह में प्रत्येक राशि की संक्रांति क्रमशः आती रहती है इनमें मकर संक्रांति का विशेष महत्व बताया गया है। क्योंकि यह संक्रांति सौम्यायन संक्रांति है। इस दिन भगवान भुवन भास्कर उत्तरायण हो जाते हैं। मकर आदि 6 तथा कर्क आदि 6 राशियों का भोग करते समय सूर्य क्रमशः उत्तरायण और दक्षिणायन में रहते हैं ।इसी दिन से सूर्य देव के उत्तरायण होने से देवताओं का ब्रह्म मुहूर्त प्रारंभ होता है। अतः उत्तरायण होने पर वे देवताओं के तथा दक्षिणायन में पितरों के अधिपति(स्वामी )होते हैं। सूर्य 12 रहों राशियों में प्रवेश करता है इसलिए वर्ष में लगभग 11 संक्रांति होती है। दक्षिणायन से उत्तरायण में आने की सूर्य की यह प्रक्रिया और एक राशि से दूसरे राशि में सूर्य के प्रवेश दोनों का संगम ही मकर संक्रांति कहलाती है। मकर संक्रांति दक्षिण भारत उत्तर भारत तथा मिथिलांचल क्षेत्र में अत्यधिक महत्व है ।सूर्य देव के उत्तरायण होने के करण ही यह समय बहुत ही शुभ माना जाता है। इस पुण्य काल में दान, व्रत, उपवास, यज्ञ, होम आदि तथा यहां तक की प्राण त्यागने का भी विशेष महत्व है। दिन और रात का होना एवं मौसम में परिवर्तन होना सूर्य की परिक्रमा का ही परिणाम होता है। इस उत्सव के दिन सभी एक दूसरे के घर आते जाते हैं और तिल के लड्डू का आदान-प्रदान करते हैं ताकि आपस में प्रेम स्नेह बना रहे ।यह परम साधना की दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण है। संपूर्ण भारत में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। कहीं लोहड़ी तो कहीं खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है इस दिन दान इत्यादि का बहुत महत्व है। कहा जाता है कि इस पर्व के अवसर पर किया गया दान कई गुना फलों की प्राप्ति करता है। अतः सभी मानवों को मकर संक्रांति का पर्व पूर्ण आस्था एवं श्रद्धा के साथ मनानी चाहिए।