न्यूज स्कैन रिपाेर्टर, भागलपुर
जदयू के जिला अध्यक्ष (ग्रामीण) चुनाव को लेकर भागलपुर में सियासी पारा चढ़ गया है। 16 नामांकन दाखिल होने के बावजूद चुनाव प्रक्रिया ठप रहने और कथित अनियमितताओं को लेकर संगठन के भीतर ही गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्षता की बजाय “पूर्व-निर्धारित परिणाम” की ओर बढ़ती दिखी।
16 नामांकन, फिर भी चुनाव नहीं- क्यों?
जिला अध्यक्ष (ग्रामीण) पद के लिए 16 नेताओं ने नामांकन किया था। बावजूद इसके चुनाव संपन्न नहीं हो सका। कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संगठन की लोकतांत्रिक परंपराओं पर सीधा आघात है।
दागी चेहरों पर मेहरबानी?
आरोप है कि कुछ ऐसे व्यक्तियों के नामांकन को स्वीकार कर लिया गया, जिनकी छवि विवादित रही है। सवाल उठाया जा रहा है कि जिन उम्मीदवारों पर पूर्व में दल-विरोधी गतिविधियों के आरोप रहे, उनके खिलाफ सख्ती क्यों नहीं बरती गई?
सुल्तानगंज नगर परिषद चुनाव में “विशेष संरक्षण” का आरोप
सुल्तानगंज नगर परिषद चुनाव को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए हैं। आरोप है कि जिला निर्वाचन पदाधिकारी (ग्रामीण) अर्जुन साह ने दुर्गेश साह नामक व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि बनाकर चुनाव प्रक्रिया में शामिल कराया, जबकि विधानसभा चुनाव के दौरान दुर्गेश साह खुले तौर पर निर्दलीय प्रत्याशी निशा भारती के साथ सक्रिय रूप से जुड़े रहे थे।




बताया जा रहा है कि इसके फोटो साक्ष्य भी मौजूद हैं, जिनमें दुर्गेश साह निर्दलीय प्रत्याशी के साथ प्रचार करते नजर आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि दल-विरोधी गतिविधियों से जुड़े व्यक्ति को किस अधिकार से प्रतिनिधित्व दिया गया?
प्रस्तावक प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
कार्यकर्ताओं का आरोप है कि प्रस्तावक के रूप में केवल अधिकृत डेलीगेट्स की जगह सक्रिय सदस्यों द्वारा दिए गए प्रस्ताव को भी स्वीकार कर लिया गया। इतना ही नहीं, यह भी आरोप है कि जिला निर्वाचन पदाधिकारी ने अपने पुत्र के माध्यम से नामांकन प्रक्रिया को प्रभावित किया और उन्हें भी मैदान में उतार दिया।
यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल नैतिकता का प्रश्न है, बल्कि संगठनात्मक आचार संहिता का भी गंभीर उल्लंघन माना जाएगा।
कार्यकर्ताओं में रोष
जदयू नेता राकेश कुमार ओझा का कहना है कि जिन उम्मीदवारों ने लाखों रुपये खर्च कर, महीनों मेहनत कर चुनाव की तैयारी की, उनके साथ अन्याय हुआ है। संगठन के भीतर पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग तेज हो गई है।

एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह चुनाव कम और निजी दरबार ज्यादा लग रहा है। अगर सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है, तो सार्वजनिक स्पष्टीकरण दिया जाए।”
निंदा प्रस्ताव की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, संगठन के कई सक्रिय सदस्य तथ्यों के आधार पर निंदा प्रस्ताव लाने की तैयारी में हैं और प्रदेश नेतृत्व से हस्तक्षेप की मांग कर सकते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल:
क्या चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी थी?
क्या दल-विरोधी गतिविधियों से जुड़े लोगों को संरक्षण मिला?
क्या संगठन की आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था से समझौता हुआ?
भागलपुर की सियासत में उठे इन सवालों का जवाब अब जिला निर्वाचन पदाधिकारी और प्रदेश नेतृत्व, दोनों को देना होगा।


























