न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
पटना की ठंडी सुबहों में इन दिनों एक सवाल हवा में तैर रहा है। सवाल सीधा है, लेकिन जवाब उतना ही उलझा हुआ, क्या Nitish Kumar अपनी राजनीतिक पारी का आखिरी ओवर खेल रहे हैं? सत्ता के गलियारों में कानाफूसी है कि वे राज्य की कमान छोड़कर राज्यसभा का रास्ता चुन सकते हैं। आधिकारिक बयान इसे अफवाह बताते हैं। केंद्रीय मंत्री Chirag Paswan कहते हैं, मुख्यमंत्री बदलने की कोई चर्चा नहीं है। लेकिन राजनीति में चर्चा कभी यूँ ही नहीं जन्म लेती।
‘सम्मानजनक एग्जिट’ की पटकथा?
कई महीनों से उनकी सेहत को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति और सक्रियता को लेकर भी फुसफुसाहटें हैं। ऐसे में राज्यसभा का विकल्प एक ‘सम्मानजनक ट्रांज़िशन’ की तरह देखा जा रहा है, जहाँ सक्रिय प्रशासनिक दबाव कम होगा, लेकिन राजनीतिक प्रासंगिकता बनी रहेगी। अगर यह सच होता है, तो यह केवल पद परिवर्तन नहीं होगा। यह उस नेता का कदम होगा जिसने लगभग दो दशकों तक बिहार की सत्ता का केंद्र खुद को बनाए रखा।
उत्तराधिकार का अनकहा अध्याय
इस कहानी का दूसरा पात्र हैं उनके बेटे Nishant Kumar। पहले चर्चा थी कि उनकी एंट्री राज्यसभा के रास्ते होगी। अब नई चर्चा यह है कि अगर सत्ता में बदलाव होता है, तो भाजपा का मुख्यमंत्री और निशांत उपमुख्यमंत्री बन सकते हैं। यहीं कहानी में सबसे बड़ा मोड़ है। नीतीश कुमार वर्षों तक परिवारवाद के आलोचक रहे। अगर अंत में वे अपने बेटे के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करते दिखते हैं, तो यह उनके वैचारिक रुख पर सवाल खड़े करेगा।
पर राजनीति केवल विचारों से नहीं चलती, वह समीकरणों से भी चलती है। जदयू की सामाजिक इंजीनियरिंग… लव-कुश और ईबीसी आधार अब भी नीतीश के नाम पर ही संगठित है।
पार्टी में ललन सिंह, अशोक चौधरी और संजय झा जैसे नेता हैं, पर सामाजिक पकड़ की वह गहराई फिलहाल किसी और के पास नहीं दिखती।
भाजपा का पहला पूर्णकालिक मुख्यमंत्री?
अगर नीतीश राज्यसभा जाते हैं, तो बिहार में पहली बार भाजपा का पूर्णकालिक मुख्यमंत्री बनने की संभावना बनेगी। जिन नामों की चर्चा है, उनमें शामिल हैं …
Samrat Choudhary
Nityanand Rai
Mangal Pandey
Vijay Kumar Sinha
लेकिन भाजपा की राजनीति अक्सर अनुमान से अलग रास्ता चुनती है। जैसे Madhya Pradesh, Rajasthan और Chhattisgarh में अचानक नए चेहरे सामने आए, वैसे ही बिहार में भी कोई बिल्कुल अप्रत्याशित नाम सामने आ सकता है।
जदयू का भविष्य
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जदयू का भविष्य क्या होगा? यह पार्टी विचारधारा से ज्यादा नेतृत्व-आधारित संरचना पर टिकी रही है। अगर नेतृत्व दिल्ली शिफ्ट होता है, तो क्या संगठन नई पहचान बना पाएगा?
या फिर भाजपा धीरे-धीरे राजनीतिक स्पेस को अपने पक्ष में समेट लेगी?
इतना तय है, अगर नीतीश राज्यसभा जाते हैं, तो यह केवल एक नेता का स्थानांतरण नहीं होगा। यह बिहार की सत्ता-व्यवस्था के परिवर्तन का टर्निंग प्वाइंट होगा।
और अगर वे यहीं रहते हैं, तो यह संदेश होगा कि अभी इस कहानी का क्लाइमेक्स बाकी है।
बिहार इंतजार में है। सत्ता की पटकथा लिखी जा रही है। सवाल बस इतना है… अगला दृश्य कब सामने आएगा?


























