
बिहार की सियासत में ‘इस्तीफा’ और ‘शपथ’ के बीच का जो समय है, वह किसी सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं है। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर कयासों का बाजार गर्म है, लेकिन इस पूरी पटकथा के पीछे भाजपा की एक गहरी और सोची-समझी रणनीति काम कर रही है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने यह स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे नीतीश कुमार को हटाने में कोई हड़बड़ी नहीं दिखाएंगे। पार्टी सार्वजनिक तौर पर यह संदेश बिल्कुल नहीं देना चाहती कि वह नीतीश को दरकिनार कर अपना मुख्यमंत्री थोपने के लिए बेचैन है। भाजपा की कोशिश है कि सत्ता का हस्तांतरण इतना ‘स्मूथ’ हो कि जनता के बीच गठबंधन की एकजुटता का सकारात्मक संदेश जाए।
अन्य राज्यों के चुनाव और ‘नकारात्मक’ संदेश का डर
इस देरी के पीछे एक बड़ा कारण अन्य राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव भी हैं। भाजपा को डर है कि अगर बिहार में नीतीश कुमार जैसे कद्दावर पिछड़ा वर्ग के नेता को झटके से हटाया गया, तो इसका नकारात्मक असर चुनावी राज्यों के वोट बैंक पर पड़ सकता है। विपक्षी दल इसे ‘सहयोगियों को खत्म करने वाली भाजपा’ के नैरेटिव के रूप में पेश कर सकते हैं। इसी राजनीतिक जोखिम से बचने के लिए ऑपरेशन ‘सत्ता परिवर्तन’ को फिलहाल होल्ड पर रखा गया है।
मई का ‘मुहूर्त’ और बार्गेनिंग का खेल
तकनीकी तौर पर नीतीश कुमार 6 महीने तक बिना किसी सदन के सदस्य रहे मुख्यमंत्री रह सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह पूरी प्रक्रिया मई के पहले सप्ताह के बाद, यानी अन्य महत्वपूर्ण चुनावों के संपन्न होने के बाद ही शुरू होगी। इस बीच का समय ‘बार्गेनिंग’ के लिए इस्तेमाल हो रहा है :-
JDU की शर्तें: जदयू अपने भविष्य के मंत्रियों और गृह विभाग जैसे मलाईदार विभागों को लेकर भाजपा से लोहा ले रही है।
संसदीय व्यवस्था का सहारा: भाजपा नीतीश को तब तक पद पर बनाए रख सकती है जब तक कि नए समीकरण पूरी तरह फिट न हो जाएं।
विधानसभा चुनाव 2025 का पेंच
अगले साल होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव का पेंच भी इसी बदलाव में फंसा है। भाजपा ऐसा चेहरा चाहती है जो नीतीश की विदाई के बाद उनके वोट बैंक (Luv-Kush और EBC) को अपने पाले में ला सके। जब तक यह ‘सोशल इंजीनियरिंग’ कागजों से उतरकर जमीन पर पुख्ता नहीं हो जाती, तब तक भाजपा नीतीश कुमार के साये में ही रहना पसंद करेगी।































