मंत्री दीपक प्रकाश के सीतामढ़ी दौरे से पार्टी विधायक ने बनाई दूरी, सोशल मीडिया पर बया की दिल की बात
न्यूज स्कैन ब्यूरो, सीतामढ़ी/पटना
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) में मचा घमासान अब सार्वजनिक होने लगा है। पार्टी अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के हालिया सीतामढ़ी दौरे ने संगठन के भीतर की दरार को पूरी तरह उजागर कर दिया है। कहने को तो दीपक प्रकाश ‘ऑल इज वेल’ का दावा कर रहे हैं, लेकिन धरातल पर पार्टी के इकलौते स्थानीय विधायक का उनसे दूरी बनाना कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है।
सीतामढ़ी में दिखा बगावत का ट्रेलर
पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश दो दिवसीय दौरे पर सीतामढ़ी पहुंचे थे। उन्होंने योजनाओं की समीक्षा की, प्रखंडों का दौरा किया और मीडिया से रूबरू हुए। लेकिन 24 घंटे से अधिक समय तक जिले में रहने के बावजूद बाजपट्टी से आरएलएम विधायक रामेश्वर कुशवाहा उनके साथ कहीं नजर नहीं आए। यह अनुपस्थिति महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि कुशवाहा परिवार से बढ़ती दूरी का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।
‘पुत्र मोह’ ने बिगाड़ा पार्टी का गणित
जानकारों की मानें तो पार्टी में असंतोष की जड़ नीतीश मंत्रिमंडल का गठन है। आरएलएम के चार विधायकों को उम्मीद थी कि उनमें से किसी एक को मंत्री बनने का मौका मिलेगा। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा ने सबको चौंकाते हुए अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनवा दिया, जो वर्तमान में किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। इसी ‘परिवारवाद’ ने निर्वाचित विधायकों के बीच बेचैनी पैदा कर दी है।
सोशल मीडिया पर ‘शब्दों के बाण’
विधायक रामेश्वर कुशवाहा ने सीधे तौर पर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके हालिया सोशल मीडिया पोस्ट ने नेतृत्व पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। उन्होंने लिखा… “जब नेतृत्व की नीयत धुंधली हो जाए और नीतियां जनहित से अधिक स्वार्थ की दिशा में मुड़ने लगें, तब जनता को भ्रमित नहीं रखा जा सकता।” एक अन्य पोस्ट में उन्होंने ‘आत्म दीपो भवः’ का संदेश देते हुए खुद की राह चुनने का संकेत भी दिया है।
बागी विधायकों का भविष्य और कुशवाहा का ‘सीक्रेट प्लान’
पार्टी के तीन बागी विधायकों, रामेश्वर महतो, आलोक सिंह और माधव आनंद ने पार्टी पर अपना दावा ठोक कर उपेंद्र कुशवाहा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन विधायकों के पास जनाधार से ज्यादा धनबल की ताकत है, और भाजपा-जदयू फिलहाल इन्हें अपनाने में हिचक रहे हैं क्योंकि इससे गठबंधन में गलत संदेश जा सकता है।
ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा के पास अपनी राजनीति और बेटे की कुर्सी बचाने के लिए एक ही रास्ता बचता है… ‘जेडीयू में विलय’। चर्चा है कि कुशवाहा अपनी पार्टी का विलय जनता दल यूनाइटेड में कर सकते हैं, जिससे बागी विधायक स्वतः ही जदयू के अनुशासन में आ जाएंगे और दीपक प्रकाश की मंत्री पद की दावेदारी भी सुरक्षित रहेगी।
































