भागलपुर में ‘गंगा संवाद’: नदियों के अस्तित्व, आजीविका और विकास मॉडल पर उठा बड़ा सवाल

न्यूज स्कैन ब्यूरो, भागलपुर

शहर के एक स्थानीय होटल में गंगा मुक्ति आंदोलन की ओर से “गंगा संवाद” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से जुड़े नदी कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। संवाद का केंद्र बिंदु गंगा सहित अन्य नदियों का अस्तित्व, जलवायु परिवर्तन, विस्थापन और विकास मॉडल की समीक्षा रहा।
संवाद की अध्यक्षता वरिष्ठ समाजकर्मी रामशरण ने की। उन्होंने कहा कि आज गंगा और अन्य नदियों के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। यह केवल नदी का सवाल नहीं, बल्कि उस पर निर्भर मछुआरों और किसानों की आजीविका का भी प्रश्न है। उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास नीति को चुनौती देने की जरूरत है और अरावली पर्वत जैसे पर्यावरणीय सवालों पर समाज को एकजुट होना होगा।
झारखंड के पर्यावरणविद घनश्याम ने कहा, “श्रम और प्रकृति के समायोजन से ही संस्कृति बनती है। आज श्रम को दरकिनार करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए ‘जस्ट ट्रांजिशन’ की बात करनी होगी और कोयले की खपत पर तत्काल रोक लगाने की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।” उन्होंने गंगा बेसिन में आर्सेनिक और यूरेनियम के अंश मिलने पर चिंता जताते हुए जंगल, नदी और पहाड़ को एक साथ बचाने की जरूरत बताई।
संचालन करते हुए वक्ताओं ने कहा कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवन रेखा है। गंगा का क्षरण हमारी संस्कृति और सभ्यता के क्षरण के समान है।
डा. योगेंद्र ने कहा कि गंगा और अन्य नदियों को अविरल बहने दिया जाए तो वे स्वयं को शुद्ध कर सकती हैं। उन्होंने दावा किया कि वर्तमान में गंगा में गंगोत्री का जल नहीं पहुंच पा रहा है। 1982 में शुरू हुए गंगा मुक्ति आंदोलन का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि 1990 में गंगा की जमींदारी समाप्त कर फ्री फिशिंग की व्यवस्था लागू की गई थी, पर बाद में सोनस क्षेत्र को अभयारण्य घोषित किए जाने से मछुआरों की आजीविका प्रभावित हुई। उन्होंने कहा कि गंगा सफाई के नाम पर कई ट्रीटमेंट प्लांट लगे, लेकिन प्रदूषण की समस्या जस की तस है।
पश्चिम बंगाल के मालदा जिले की गंगा भांगन समिति के मो. अनवर ने राजमहल क्षेत्र में कटाव और प्रशासनिक विसंगतियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि जमीन का कागजात मालदा के पास है, लेकिन गंगा की धारा बदलने से नियंत्रण झारखंड का हो गया है। इससे लगभग ढाई लाख लोग प्रभावित हैं और पुनर्वास की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाई है।
कोशी नव निर्माण मंच के इंद्र नारायण सिंह ने कोशी तटबंध की समस्या पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि 1965 से अब तक तटबंध नौ बार टूट चुका है। तटबंध बनने के बाद नदी उथली हो गई और अब लगभग 12 लाख लोग तटबंध के भीतर बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जीवन यापन कर रहे हैं। उन्होंने तटबंध के भीतर रहने वाले लोगों के पुनर्वास की मांग की।
महेन्द्र यादव ने कोशी-मेची परियोजना पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रस्तावित नहर की अधिकतम क्षमता 20 हजार क्यूसेक है, जबकि कोशी में हर वर्ष लगभग पांच लाख क्यूसेक पानी बहता है। ऐसे में परियोजना की व्यवहारिकता पर प्रश्नचिह्न है।
कोलकाता से आए मछुआ प्रतिनिधि मिलन दास ने सुंदरवन क्षेत्र में मछलियों की घटती संख्या पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पानी की गुणवत्ता खराब होने से मछलियां समाप्त हो रही हैं, जबकि समाधान के रूप में बाहर से बीज डालने की बात की जा रही है, जो दीर्घकालिक समाधान नहीं है।
डा. मनोज ने चांदन नदी की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पहले नदी के दोनों ओर तीन फसलें होती थीं, लेकिन बालू उठाव के कारण अब नदी सूखने की कगार पर है। उन्होंने कहा कि समाधान आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन में है।
पश्चिम बंगाल की लेखिका जया मित्र ने कहा कि प्रकृति को “संसाधन” कहकर हम उसके साथ अन्याय कर रहे हैं। उन्होंने विकास के मौजूदा पैमाने की आलोचना करते हुए संस्कृति को नए सिरे से समझने की जरूरत बताई।
डॉ. राजेंद्र विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. फारूक अली ने कहा कि सीमेंट लॉबी के दबाव में पर्यावरण की अनदेखी कर कंक्रीट का जंगल खड़ा किया जा रहा है। विकास के नाम पर पहाड़ और जंगल नष्ट हो रहे हैं।
सुनील साहनी ने मछुआरों की रोजगार समस्या, जल प्रदूषण और अभयारण्य कानून के प्रभावों पर चर्चा की। शाहिद कमाल ने मुजफ्फरपुर की नदियों की समस्याओं को उठाया, जबकि कृष्णा जी ने कहा कि बांध और बराज बनने से नदियों की धारा कमजोर हुई और गाद जमाव बढ़ा है। उन्होंने नदियों की अविरलता सुनिश्चित करने की मांग की।
संवाद के अंत में प्रतिभागियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संगठनों के साथ नेटवर्क बनाने, पर्यावरण केंद्रित पत्रिका प्रकाशित करने और राजनीतिक दलों के संवेदनशील नेताओं के साथ संवाद स्थापित कर नदियों की अविरलता, स्वच्छता और संवेदनशील नीतियों के लिए पहल करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार हेमंत, शाहिद कमाल, डॉ. मनोज, डा. फारूक अली, गौतम कुमार, ललन, जया मित्र, डा. अलका सिंह, बलराम चौरसिया, रेनू सिंह, राहुल, सुनील साहनी, रोहित कुमार सिंह, अब्दुल्लाह मुसलहुद्दीन, बदरूजवान, मुसरेकुल अनवर, संजय कुमार बसक, कुमु मंडल, गौतम पाल, अंजन घोष, नरेश सिंह, संजय कुमार, रीता देवी, नवज्योति पटेल सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।