न्यूज स्कैन रिपाेर्टर, भागलपुर
मछुआ समुदाय की आजीविका, जलवायु संकट और नदियों के भविष्य पर केंद्रित “मछुआ आजीविका अधिकार प्रांतीय शिविर” का समापन रविवार, 22 दिसंबर 2025 को हुआ। कार्यक्रम का आयोजन जल श्रमिक संघ एवं बिहार प्रदेश मत्स्यजीवी जल श्रमिक संघ के संयुक्त तत्वावधान में होटल आमंत्रण, सूजागंज में किया गया।
शिविर में कोसी, गंगा सहित बिहार की नदियों से जुड़े पारंपरिक मछुआरों की समस्याओं, जलवायु परिवर्तन, तटबंधों के दुष्प्रभाव, महिलाओं की भूमिका और संगठन की मजबूती पर गंभीर विमर्श हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता महेंद्र यादव, डॉ. शरद, उदय, डॉ. मनोज कुमार और रामशरण रहे, जिन्होंने क्रमशः कोसी नदी व तटबंध, संगठन व समुदाय, जलवायु संकट व जलवायु न्याय, नदियों का संकट और मछुआ आजीविका जैसे विषयों पर अपने विचार रखे।
कोसी तटबंध ने गांवों को किया अदृश्य : महेंद्र यादव
महेंद्र यादव ने कोसी तटबंध के भीतर बसे लोगों की व्यथा साझा करते हुए कहा कि कोसी को बिहार का शोक यूं ही नहीं कहा जाता। कोसी बार-बार अपनी धारा बदलती है, जिससे गांव के गांव कट जाते हैं। बाढ़ से बचाव के नाम पर बनाए गए तटबंधों ने स्थिति और भयावह कर दी।
उन्होंने कहा कि तटबंध बनने के बाद दर्जनों गांव कोसी के भीतर फंस गए, जिन्हें आज सरकार पहचानने से भी इंकार कर रही है। इन गांवों में सड़क, बिजली, पानी और स्कूल जैसी मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं।
तीन-चार महीनों तक लोग पानी के बीच जीवन जीने को मजबूर रहते हैं। गांव की पहचान खत्म होते ही वहां रहने वाले लोगों की पहचान भी खत्म हो गई है। यह मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है और सरकार अपनी जवाबदेही निभाने में विफल रही है।
संगठन मजबूत होगा तो सरकार भी जनपक्षीय होगी : डॉ. शरद
सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. शरद ने कहा कि जिस समाज में संगठन मजबूत होता है, वहां सरकार भी जवाबदेह और जनपक्षीय होती है।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि किसी भी संगठन की मजबूती के लिए महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य है। मछुआ समाज में पुरुष जहां मछली पकड़ते हैं, वहीं महिलाएं मछली बेचने का कार्य करती हैं और उन्हें कार्यस्थल पर कई प्रकार की यौन हिंसा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।
सरकार द्वारा बनाए गए शिकायत तंत्र और कानूनों की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं को अधिकारों के साथ मुख्यधारा से जोड़े बिना मछुआ समाज का विकास संभव नहीं है।
नदियां बचेंगी तो मछुआरे बचेंगे : डॉ. मनोज कुमार
महात्मा गांधी वर्धा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि मछुआरे सीधे नदियों से जुड़े हैं, लेकिन आज नदियों की हालत बेहद चिंताजनक है। कई छोटी नदियां सूख चुकी हैं, जहां कभी मछली प्रचुर मात्रा में मिलती थी।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नदियों, जंगलों और पेड़ों को नहीं बचाया गया, तो पूरा इकोसिस्टम नष्ट हो जाएगा। मछुआरों की आजीविका का प्रश्न सिर्फ उनका नहीं, बल्कि पूरे समाज और पर्यावरण प्रेमियों का प्रश्न है।
फरक्का और बांधों ने नदियों को खत्म किया : उदय
उदय ने नदियों पर बनाए जा रहे बांधों और औद्योगिक प्रदूषण पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट हितों के लिए सरकार नदियों को समाप्त कर रही है।
फरक्का बैराज बनने के बाद गंगा में पाई जाने वाली दो दर्जन से अधिक मछली प्रजातियां समाप्त हो चुकी हैं। समुद्र से गंगा में आने वाली मछलियां अब नहीं आ पा रही हैं, जिससे उनका जीवन चक्र टूट गया है।
उन्होंने कहा कि गंगा की जैव विविधता का खत्म होना, मछुआरों और गंगा किनारे बसने वाली सभ्यता के खत्म होने के समान है।

मछुआरों को क्षतिपूर्ति दे सरकार : रामशरण
रामशरण ने कहा कि सरकार गंगा, उसकी सहायक नदियों और इन पर निर्भर समुदायों के प्रति संवेदनहीन बनी हुई है। पारंपरिक मछुआरों के पास न तो जमीन है और न ही कोई वैकल्पिक संसाधन।
जलवायु परिवर्तन व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर लिए गए गलत फैसलों का परिणाम है। इसका सीधा असर मछुआरों की आजीविका पर पड़ा है। इसलिए सरकार को मछुआरों को क्षतिपूर्ति और वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिए।
बिहार के कई जिलों से जुटे मछुआरे
शिविर में समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, बांका, भागलपुर, कहलगांव, नाथनगर, नवगछिया, पटना, सारण, मुंगेर सहित कई जिलों से आए पारंपरिक मछुआरों ने भाग लिया और अपने अनुभव साझा किए।
कार्यक्रम का समापन मछुआ समुदाय के अधिकारों की रक्षा, नदियों के संरक्षण और जलवायु न्याय के लिए सामूहिक संघर्ष के संकल्प के साथ हुआ।
































