न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
अगर आप बिहार के किसी शहर या उसके आसपास जमीन खरीदने या घर बनाने की योजना बना रहे हैं, तो आपके पास मार्च तक का ही ‘गोल्डन टाइम’ है। 1 अप्रैल से बिहार में जमीन-जायदाद की रजिस्ट्री कराना महंगा होने जा रहा है। सरकार ने जमीन का एमवीआर (Market Value Rate) बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह फैसला सीधे तौर पर मध्यम वर्ग की कमर तोड़ेगा, जो पहले से ही महंगाई से जूझ रहा है। विभाग ने सभी जिलों में सर्वे का काम शुरू कर दिया है और रिपोर्ट तैयार की जा रही है। अगर आप निवेश की सोच रहे हैं, तो 1 अप्रैल 2026 से नई दरें लागू होने से पहले फैसला लेना समझदारी होगी।
आम आदमी पर इन 3 तरीकों से पड़ेगा सीधा असर:
- रजिस्ट्री का खर्च बढ़ेगा: जमीन की रजिस्ट्री का खर्च ‘सर्किल रेट’ या ‘एमवीआर’ पर तय होता है। खबर के मुताबिक, 2016 के बाद अब यानी 10 साल बाद दरों में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अगर अभी किसी जमीन का सरकारी रेट 10 लाख रुपये है और उस पर आप करीब 8-10% रजिस्ट्री खर्च (स्टांप ड्यूटी + कोर्ट फीस) देते हैं, तो MVR बढ़ते ही वह बेस प्राइस 15 या 20 लाख हो सकता है। यानी, आपको रजिस्ट्री के लिए अब दोगुनी रकम चुकानी पड़ सकती है।
- शहर से 8 किलोमीटर दूर भी राहत नहीं: आम तौर पर लोग शहर की महंगी जमीन छोड़कर आउटर (बाहरी) इलाकों में घर बनाते थे। लेकिन नई नीति में ‘पेरिफेरल्स’ (शहर के आसपास 8 किमी का दायरा) को खास तौर पर टारगेट किया गया है।
शहर से सटे गांवों या विकसित हो रहे इलाकों में जमीन की कीमतें शहर के बराबर पहुंचने वाली हैं। मध्यम वर्ग के लिए सस्ते विकल्प खत्म हो जाएंगे। - किराये पर भी पड़ेगी मार : जब प्रॉपर्टी महंगी होगी और टैक्स बढ़ेगा, तो मकान मालिक इसकी भरपाई किरायेदार से करेंगे। कमर्शियल और रिहायशी, दोनों तरह के किराये में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
किसके लिए है खुशखबरी?
यह खबर सिर्फ बुरी नहीं है। जिन किसानों या रैयतों की जमीन शहर के आसपास है, उन्हें अब अपनी जमीन का ‘उचित सरकारी मुआवजा’ या बाजारी कीमत मिलेगी। अब तक सरकारी रेट कम होने से उन्हें जमीन अधिग्रहण के वक्त नुकसान होता था, जो अब सुधरेगा।
औद्योगिक बदलाव:
पहली बार औद्योगिक क्षेत्रों की जमीन के लिए अलग श्रेणी बनाई जा रही है। इससे उद्यमियों को स्पष्टता मिलेगी, लेकिन नई यूनिट लगाना महंगा हो सकता है।

































