बिहार के अस्पतालों में अब ‘राम भरोसे’ नहीं चलेगा काम: स्वास्थ्य विभाग का ‘डे प्लान’ लाएगा क्रांति या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था, जो अक्सर मोबाइल टॉर्च की रोशनी में होने वाले ऑपरेशनों और लापता डॉक्टरों के कारण सुर्खियों में रहती है, अब एक बड़े बदलाव की दहलीज पर है। स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों की ‘सेहत’ सुधारने के लिए ‘डे प्लान’ (Day Plan) मॉडल लागू किया है। अब राज्य के करीब 2500 सरकारी अस्पतालों में मनमानी नहीं चलेगी… हर सुबह 10 बजे तक तय होगा कि आज अस्पताल में क्या और कैसे होगा। ‘डे प्लान’ बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक ‘संजीवनी’ साबित हो सकता है, बशर्ते यह केवल फाइलों तक सीमित न रहे। जनता को अब उम्मीद है कि अस्पताल पहुंचने पर उन्हें ताला नहीं, बल्कि तैनात डॉक्टर मिलेंगे। लेकिन स्टाफ की कमी, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी जैसे मामलों पर जब तक कार्रवाई नहीं होगी इस तरह की योजना प्रभावी नहीं हो सकती है।

स्वास्थ्य मंत्री मंगल पाण्डेय ने कहा कि, “मरीजों को अस्पतालों में सम्मानजनक और सही इलाज मिले, इसके लिए हम एक-एक बेड, दवा और डॉक्टर की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग कर रहे हैं।”

आम जनता को क्या होगा सीधा फायदा?
इस नई व्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र ‘मरीज’ है। जानिए आपके लिए क्या बदलेगा :-

डॉक्टरों की ‘गायब’ होने की आदत पर लगाम: अब सुबह ही डॉक्टरों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाएगी। रीयल-टाइम मॉनिटरिंग से मरीजों को बिना इलाज के वापस नहीं लौटना पड़ेगा।

दवाइयों का संकट होगा खत्म: अस्पताल में दवाओं का स्टॉक खत्म होने से पहले ही सिस्टम अलर्ट देगा, ताकि आपको बाहर की महंगी दुकानों पर न भागना पड़े।

टॉर्च की रोशनी में इलाज से मिलेगी मुक्ति: बिजली, पानी और साफ-सफाई जैसे बुनियादी मुद्दों के लिए कार्यपालक निदेशक कुमार गौरव की अध्यक्षता वाली 14 सदस्यीय टीम सीधे जवाबदेह होगी।

शिकायत पर तुरंत एक्शन: लापरवाही मिलने पर डॉक्टरों और कर्मचारियों पर ‘ऑन द स्पॉट’ कार्रवाई का प्रावधान है, जिससे व्यवस्था में डर और अनुशासन आएगा।

कड़वी सच्चाई: क्यों उठानी पड़ी यह सख्ती?
सरकार का यह फैसला बिहार के स्वास्थ्य ढांचे की उन शर्मनाक तस्वीरों का नतीजा है, जिन्होंने व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया था। गोपालगंज और मधुबनी में टॉर्च की रोशनी में हुए ऑपरेशन, और बिहारशरीफ में दोपहर तक अस्पताल में लटके ताले इस बात के गवाह हैं कि बिना सख्त मॉनिटरिंग के बदलाव मुमकिन नहीं है।

ये भी जानिए कि चुनौतियां क्या हैं?

योजना तो शानदार है, लेकिन क्या यह भ्रष्टाचार और स्टाफ की कमी की दीवार को लांघ पाएगी? बिहार के स्वास्थ्य विभाग के सामने तीन सबसे बड़े कांटे हैं:

पदों की रिक्तियां: जब तक डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के खाली पद नहीं भरे जाते, मौजूदा स्टाफ पर मॉनिटरिंग का बोझ कितना असर करेगा?

पावर बैकअप: केवल आदेश से बिजली नहीं आती; अस्पतालों को ठोस इंफ्रास्ट्रक्चर और जनरेटर की जरूरत है।

निचले स्तर का सिंडिकेट: क्या मुख्यालय में बैठे 14 अधिकारी दूर-दराज के गांवों में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म कर पाएंगे?