न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार सरकार अब सूबे की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए एक बड़ा ‘ऑपरेशन’ करने जा रही है। नीतीश सरकार की ‘सात निश्चय-3’ योजना के तहत अब सरकारी डॉक्टरों के प्राइवेट प्रैक्टिस करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की तैयारी है। सरकार का सीधा संदेश है, या तो सरकारी सेवा कीजिए या अपनी प्राइवेट दुकान चलाइए, दोनों एक साथ नहीं चलेंगे।
बिहार में यह प्रयोग पहले भी चर्चा में रहा है, लेकिन डॉक्टरों के विरोध और संसाधनों की कमी के कारण फेल होता रहा है। अब देखना यह है कि डॉ. रेखा झा की अध्यक्षता वाली कमेटी जो रिपोर्ट देगी, क्या उसे सरकार भविष्य की चुनौतियों के बीच सख्ती से लागू कर पाएगी?
एम्स और चंडीगढ़ पीजीआई का मॉडल होगा लागू
स्वास्थ्य विभाग ने इस बड़े बदलाव के लिए 6 सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया है। यह कमेटी एम्स (AIIMS) और पीजीआई चंडीगढ़ जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के मॉडल का अध्ययन करेगी।
नॉन-प्रैक्टिस अलाउंस (NPA): प्राइवेट प्रैक्टिस छोड़ने के बदले डॉक्टरों को मूल वेतन का लगभग 20% तक अतिरिक्त भत्ता देने पर विचार हो रहा है।
विशेष प्रोत्साहन राशि: गांवों और दूरदराज के इलाकों में तैनात होने वाले डॉक्टरों को ‘स्पेशल इंसेंटिव’ देकर प्रोत्साहित किया जाएगा ताकि ग्रामीण बिहार को झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे न रहना पड़े।
दलालों और ‘कमीशन’ के खेल पर नकेल
सिर्फ डॉक्टर ही नहीं, बल्कि अस्पतालों में सक्रिय ‘सिंडिकेट’ पर भी गाज गिरने वाली है। स्वास्थ्य सचिव लोकेश कुमार सिंह ने राज्य के सभी डीएम (DM) को कड़े निर्देश दिए हैं:
सरकारी अस्पतालों से मरीजों को निजी नर्सिंग होम और जांच केंद्रों में भेजने वाले बिचौलियों को चिह्नित कर जेल भेजा जाए।
हर जिले में एक ‘निरीक्षण दल’ बनेगा, जिसकी कमान सीनियर डिप्टी कलेक्टर के हाथ में होगी।
अगर कोई सरकारी कर्मचारी या अधिकारी इस दलाली में शामिल पाया गया, तो उस पर सीधी कानूनी कार्रवाई होगी।

































