न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार में कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी संभालने वाले पुलिसकर्मियों के लिए नीतीश सरकार ने ‘सुशासन’ का नया मॉडल पेश किया है। गृह मंत्री सम्राट चौधरी की हालिया घोषणाएं केवल चुनावी वादे नहीं, बल्कि पुलिस बल के उस मानसिक दबाव को कम करने की कोशिश हैं, जो ड्यूटी और परिवार के बीच झूलता रहता है।
- शिक्षा का ‘आवासीय’ समाधान: तबादलों के दर्द से मुक्ति
पुलिस की नौकरी में सबसे बड़ी बाधा बच्चों की पढ़ाई होती है। हर तीन साल में तबादला (Transfer) बच्चे का स्कूल और माहौल बदल देता है।
सभी 40 पुलिस लाइनों में आवासीय विद्यालय खोलना एक क्रांतिकारी कदम है। इससे जवानों का अपने बच्चों से दूर रहने का मलाल कम होगा और शिक्षा की निरंतरता (Continuity) बनी रहेगी। यह कदम पुलिस बल में ‘रिटेंशन’ और ‘जॉब सैटिस्फैक्शन’ को बढ़ाएगा। - स्वास्थ्य और कैशलेस इलाज : जान की कीमत और सरकारी सुरक्षा
आंकड़े डराने वाले हैं—बीमा राशि पाने वाले 36 में से 24 जवानों की मौत बीमारी से हुई। यह दर्शाता है कि पुलिस की नौकरी का तनाव शारीरिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहा है।
अभी तक इलाज के लिए जवानों को पहले खर्च करना पड़ता था और फिर रीइम्बर्समेंट (Reimbursement) का इंतजार। कैशलेस सुविधा शुरू होने से क्रिटिकल केयर के समय पैसों की कमी जान के आड़े नहीं आएगी। यह कदम जवानों के मनोबल को दोगुना करने वाला है। - जीविका दीदी की रसोई: स्वास्थ्य और रोजगार का संगम
30 जनवरी तक सभी 39 पुलिस लाइनों में ‘जीविका दीदी की रसोई’ अनिवार्य करना एक साथ दो निशाने साधता है।
जवानों को मेस के घटिया खाने के बजाय स्वच्छ और पौष्टिक भोजन मिलेगा।
ग्रामीण महिलाओं (जीविका दीदियों) को एक बड़ा और स्थिर बाजार मिलेगा। यह बिहार सरकार के ‘सोशल इंजीनियरिंग’ मॉडल का हिस्सा है। - बीमा योजना का सुरक्षा कवच
बैंक ऑफ बड़ौदा के साथ मिलकर ₹43 करोड़ का वितरण और आत्महत्या जैसे मामलों में भी ₹20 लाख का कवर यह बताता है कि सरकार अब पुलिसकर्मियों के “मेंटल हेल्थ” और उनके बाद उनके परिवार के भविष्य को लेकर अधिक संवेदनशील हुई है।
































