केंद्रीय बजट 2026-27: दिल्ली की दहलीज पर बिहार की ‘पुरानी मांगें’, क्या इस बार मिटेगा उपेक्षा का मलाल?

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार एक बार फिर दिल्ली की दहलीज पर खड़ा है। मौका है केंद्रीय बजट 2026-27 के पूर्व परामर्श का, जहाँ बिहार के वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने केंद्र सरकार के सामने मांगों की एक लंबी फेहरिस्त रखी है। सवाल यह नहीं है कि मांगें क्या हैं, सवाल यह है कि क्या इस बार ‘सुशासन’ के दावों को केंद्र के ‘सबका साथ’ का ठोस सहारा मिलेगा? बिहार हर साल बजट से पहले इन्हीं मांगों को दोहराता है। चाहे वह कृषि को ‘उच्च उपज वाले व्यवसाय मॉडल’ में बदलना हो या नेपाल से आने वाली नदियों का वैज्ञानिक समाधान। लेकिन हकीकत यह है कि जब तक बिहार को औद्योगिक मैप पर जगह नहीं मिलती और बाढ़ का स्थायी हल नहीं निकलता, तब तक ‘संतुलित विकास’ महज एक कागजी शब्द बनकर रह जाएगा।

  1. उद्योगों के बिना ‘संतुलित विकास’ कैसे?
    वित्त मंत्री बिजेंद्र यादव ने साफ शब्दों में कहा है कि बिहार के संतुलित विकास के लिए अब उद्योगों की स्थापना अनिवार्य है। बिहार के पास जल संसाधन, जैव-विविधता और सबसे महत्वपूर्ण ‘कुशल श्रमिक’ (Skilled Labour) मौजूद हैं।
    विद्रूपता देखिए कि बिहार के यही श्रमिक दूसरे राज्यों के औद्योगिक पहिए घुमाते हैं, लेकिन अपने राज्य में वे ‘निवेश’ और ‘रोजगार’ की बाट जोह रहे हैं। राज्य सरकार ने ‘सात निश्चय-3’ का आगाज कर दिया है, लेकिन इसकी सफलता आगामी केंद्रीय बजट के ‘संस्थागत समर्थन’ पर टिकी है।
  2. बाढ़ की आपदा के स्थायी समाधान की तलाश
    बिहार के लिए बाढ़ कोई कुदरती हादसा नहीं, बल्कि एक वार्षिक ‘आर्थिक त्रासदी’ है। केंद्र से इस बार ‘रिलीफ एवं डिजास्टर रिजिलिएंट पैकेज’ की मांग की गई है। नदी जोड़ो परियोजना पर जोर देने की मांग की गई है। वित्त मंत्री ने इसे प्राथमिकता देने की बात कही है, ताकि उत्तर बिहार की नदियों के कहर को नियंत्रित किया जा सके। अब सिर्फ तटबंधों से काम नहीं चलेगा। मांग की गई है कि सैटेलाइट आधारित पूर्वानुमान, GIS मैपिंग और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग जैसी तकनीक के लिए विशेष फंड मिले।
  3. वित्तीय सीमाओं को भी बढ़ाने की मांग
    बिहार सरकार ने केंद्र से अपनी वित्तीय सीमाओं को बढ़ाने की भी गुहार लगाई है। राज्य ने 2.0 प्रतिशत अतिरिक्त ऋण लेने की अनुमति मांगी है। पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) के लिए दीर्घकालिक ब्याज मुक्त ऋण की मांग दोहराई गई है। एक महत्वपूर्ण मांग यह भी है कि केंद्र द्वारा वसूले जाने वाले उपकरों और अधिभारों का राज्यों के साथ उचित बंटवारा हो।