न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार विद्यालय परीक्षा समिति ने डीएलएड संयुक्त प्रवेश परीक्षा का रिजल्ट जारी कर दिया। कुल 79.01 प्रतिशत बच्चे सफल हुए हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस सफलता का मतलब क्या नामांकन हो जाना है? बेसिक गुणा-गणित को समझिए…
एक अनार, आठ बीमार
कुल पास अभ्यर्थी: 2,55,468
कुल सीटें (सरकारी + प्राइवेट): 30,800
इसका अर्थ यह हुआ कि लगभग 2 लाख 24 हजार से ज्यादा अभ्यर्थी पास होने के बावजूद एडमिशन नहीं ले पाएंगे। यानी हर 1 सीट के लिए औसतन 8 से 9 छात्रों के बीच फाइट है।
सवाल यही है कि बच्चे खुशी मनाएं तो कैसे? 2.5 लाख पास तो हो गए, लेकिन 2.25 लाख छात्रों का ‘शिक्षक बनने का सपना’ एडमिशन के गेट पर ही दम तोड़ देगा। बिहार में D.El.Ed की सीटें ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ क्यों?”
सरकारी कॉलेज का ‘कटऑफ’ युद्ध
सरकारी (DIET/PTEC) कॉलेज में फीस बहुत कम है (10-20 हजार में पूरा कोर्स), जबकि प्राइवेट कॉलेज में यह 1.20 लाख तक जाती है। सरकारी सीटें सिर्फ 9,100 हैं।
“गरीब छात्र कहां जाएं? सरकारी कॉलेज की 9100 सीटों के लिए तो मारामारी मचेगी। जिनका सरकारी में नहीं होगा, क्या वे प्राइवेट कॉलेजों की भारी-भरकम फीस चुका पाएंगे? या फिर प्राइवेट कॉलेजों के लिए यह ‘कमाई का सीजन’ बनने वाला है?” एक्सपर्ट के अनुमान के मुताबिक सरकारी कॉलेज के लिए कट-ऑफ 85-90% तक जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ‘साइड इफेक्ट’
सुप्रीम कोर्ट ने प्राइमरी (1-5) से B.Ed को बाहर कर दिया है। अब प्राइमरी टीचर बनने का एकमात्र रास्ता D.El.Ed है। इसीलिए इस बार क्रेज इतना ज्यादा है और पास प्रतिशत (79%) भी।
B.Ed बाहर हुआ तो D.El.Ed बना ‘सोना’
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बिहार के युवाओं में D.El.Ed करने की होड़। यही वजह है कि इस बार रिकॉर्ड 79% रिजल्ट आया है, क्योंकि हर कोई प्राइमरी शिक्षक की रेस में बने रहना चाहता है।
काउंसलिंग का ‘खेल’ और छात्रों की ‘चूक’
बताया गया है कि आवेदन 29 नवंबर से 5 दिसंबर तक किए जा सकते हैं। समय बहुत कम है। अक्सर छात्र ‘चॉइस फिलिंग’ में गलती करते हैं। वे सिर्फ सरकारी कॉलेज भर देते हैं और कम नंबर होने पर छंट जाते हैं।

































