न्यूज स्कैन रिपाेर्टर, भागलपुर
वित्तीय वर्ष 2026-27 के बिहार बजट को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है। जहां जनता दल (यूनाइटेड) ने इसे “विकसित बिहार के संकल्प को साकार करने वाला ऐतिहासिक बजट” बताया है, वहीं राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने इसे दिशाहीन, जनविरोधी और खोखले वादों का पुलिंदा करार दिया है।
जदयू के वरिष्ठ नेता राकेश कुमार ओझा ने बजट का स्वागत करते हुए कहा कि यह बजट न्याय के साथ विकास की सोच पर आधारित है। उन्होंने कहा कि सात निश्चय-3 के लक्ष्यों को पूरा करने, युवाओं को नौकरी-रोजगार देने और महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में यह बजट मील का पत्थर साबित होगा।

ओझा ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और उद्योग के लिए किए गए प्रावधान बिहार की विकास दर को नई गति देंगे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व और केंद्र सरकार के सहयोग से आने वाले वर्षों में बिहार देश के अग्रणी विकसित राज्यों में शामिल होगा। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि यह बजट नकारात्मक राजनीति को करारा जवाब है और जदयू इसके सफल क्रियान्वयन के लिए सरकार के साथ मजबूती से खड़ी है।
वहीं दूसरी ओर, राजद के प्रदेश प्रवक्ता अरुण कुमार यादव ने बजट को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि 2026-27 का बिहार बजट महिलाओं, किसानों, युवाओं, मजदूरों और गरीबों के बेहतर भविष्य के लिए किसी ठोस रोडमैप से विहीन है।
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी समय में किए गए बड़े-बड़े वादों—जैसे महिलाओं को 2-2 लाख रुपये देने, एक करोड़ नौकरी-रोजगार, प्रत्येक जिले में पांच उद्योग स्थापित करने, बंद चीनी मिलों को चालू करने और 25 नई चीनी मिलें लगाने के लिए बजट में कोई स्पष्ट कार्ययोजना नहीं है।

राजद प्रवक्ता ने नीतीश-भाजपा सरकार के 20 वर्षों के शासन पर सवाल उठाते हुए कहा कि बिहार को बेरोजगारी का हब बना दिया गया है। उनके अनुसार बिहार का हर व्यक्ति औसतन 29 हजार रुपये का कर्जदार है और राज्य पर पौने चार लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो चुका है, जिस पर सरकार हर साल करीब 21 हजार करोड़ रुपये ब्याज चुकाती है।
































