
बिहार की राजनीति में वफादारी और बगावत के अपने मायने हैं, और हाल ही में बिहार विधानसभा की 20 महत्वपूर्ण समितियों का पुनर्गठन इस बात की तस्दीक करता है। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने वर्ष 2026-27 के लिए कमेटियों की कमान सौंपी है, जिसमें सबसे चौंकाने वाला फैसला राजद और कांग्रेस के बागी विधायकों को सभापति की कुर्सी देना रहा है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
राज्यसभा चुनाव के दौरान अपनी ही पार्टियों (राजद और कांग्रेस) के खिलाफ स्टैंड लेने वाले विधायकों को नीतीश सरकार ने ‘बड़ा सम्मान’ दिया है। इसे सीधे तौर पर बगावत के ‘पुरस्कार’ के रूप में देखा जा रहा है।
फैसल रहमान (राजद बागी): इन्हें गैर सरकारी विधेयक एवं संकल्प समिति का सभापति बनाया गया है।
मनोहर प्रसाद सिंह (कांग्रेस बागी): इन्हें प्रत्यायुक्त विधान समिति की कमान सौंपी गई है।
जानकारों का मानना है कि यह नियुक्तियां केवल प्रशासनिक नहीं हैं, बल्कि एक गहरा राजनीतिक संदेश हैं। सरकार ने संकेत दिया है कि सत्ता का साथ देने वालों का ‘ख्याल’ रखा जाएगा, ताकि भविष्य में विपक्षी खेमे में और सेंधमारी की गुंजाइश भी बनी रहे।
प्रमुख समितियों में किसे मिली क्या जिम्मेदारी?
विधानसभा की कुल 26 कमेटियों में से 20 का गठन हो चुका है। विधानसभा अध्यक्ष खुद तीन महत्वपूर्ण समितियों (नियम, सामान्य प्रयोजन और विशेषाधिकार समिति) के सभापति होंगे।
अन्य प्रमुख नियुक्तियां इस प्रकार हैं:
विधायक का नाम आवंटित समिति
ज्योति देवी पुस्तकालय समिति
माधव आनंद शून्यकाल समिति
शैलेश कुमार (बुलो मंडल) जिला परिषद् एवं पंचायती राज समिति
अखतरुल ईमान अल्पसंख्यक कल्याण समिति
संतोष कुमार निराला एससी-एसटी कल्याण समिति
दमयन्ती देवी / अश्वमेध देवी महिला एवं बाल विकास समिति
सिद्धार्थ सौरव निवेदन समिति
अमरेन्द्र कुमार पांडेय प्रश्न एवं ध्यानाकर्षण समिति
इन 3 बड़ी समितियों में क्यों नहीं हुआ बदलाव?
विधानसभा की तीन सबसे पावरफुल कमेटियां— लोक लेखा समिति (PAC), प्राक्कलन समिति और सरकारी उपक्रम समिति के सभापतियों का चेहरा नहीं बदला गया है। इसका कारण इनका 2 वर्ष का निश्चित कार्यकाल है। फिलहाल इन पर भाई बिरेन्द्र (राजद), नीतीश मिश्रा (भाजपा) और हरिनारायण सिंह (जदयू) का कब्जा बरकरार रहेगा।
अभी 3 कमेटियों का गठन बाकी
फिलहाल 20 कमेटियों को हरी झंडी मिली है, जबकि आवास समिति, आंतरिक संसाधन एवं केंद्रीय सहायता समिति और कृषि उद्योग विकास समिति का गठन खरमास के बाद होने की संभावना है।
गठबंधन को मजबूती देने की कवायद
इस पुनर्गठन के जरिए एनडीए सरकार ने अपने सहयोगी दलों और नए साथियों को साधने की कोशिश की है। विपक्षी दलों से टूटकर आए चेहरों को तवज्जो देकर सरकार ने न केवल मौजूदा गठबंधन को स्थिरता दी है, बल्कि आगामी चुनावों से पहले विपक्ष के मनोबल को तोड़ने की रणनीति भी अपनाई है।






























