समझिए… क्या तेजस्वी यादव का ‘दिल्ली कूच’ महागठबंधन की मजबूरी है?

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नई सुगराहट है, क्या नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव राज्यसभा जाएंगे? यह सवाल केवल एक व्यक्तिगत करियर बदलाव का नहीं है, बल्कि विपक्षी एकजुटता को अक्षुण्ण रखने और ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ यानी विधायकों की खरीद-फरोख्त के खतरे को टालने की एक सोची-समझी रणनीतिक बिसात नजर आती है।

एकजुटता की ‘गारंटी’ हैं तेजस्वी
राजनीति के विश्लेषकों का मानना है कि महागठबंधन के पास पांचवीं राज्यसभा सीट जीतने के लिए पर्याप्त संख्या बल तो है, लेकिन यह संख्या बल केवल तेजस्वी यादव के नाम पर ही सुरक्षित नजर आता है। आंकड़ों की गणित कहती है कि जीत के लिए 40.5 प्रथम वरीयता के वोटों की आवश्यकता है। महागठबंधन के पास राजद, कांग्रेस और वामदलों को मिलाकर कुल 41 वोट हैं।
चुनौती यह है कि यदि तेजस्वी के अलावा किसी अन्य को उम्मीदवार बनाया जाता है, तो घटक दलों और निर्दलीयों के वोटों में बिखराव का डर है। तेजस्वी का चेहरा इस बिखराव को रोकने वाली इकलौती ‘कंक्रीट’ दीवार साबित हो सकता है।

निर्विरोध निर्वाचन का ‘सेफ’ रास्ता
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर तेजस्वी मैदान में उतरते हैं, तो एनडीए (NDA) शायद ही अपना उम्मीदवार उतारे। इसकी दो मुख्य वजहें हैं:
दबाव की राजनीति: तेजस्वी के कद के सामने किसी ‘धनबली’ उम्मीदवार को उतारना एनडीए के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
बदनाम होने का डर: विपक्ष को डर है कि अगर तेजस्वी नहीं लड़ते हैं, तो एनडीए किसी धनवान उम्मीदवार को उतारकर ‘धन और सत्ता’ के खेल से चुनाव को जटिल बना सकता है।
तेजस्वी की उम्मीदवारी इस संभावना को खत्म कर निर्विरोध निर्वाचन का रास्ता साफ कर सकती है।

लालू यादव के हाथ में अंतिम फैसला
राजद संसदीय बोर्ड ने उम्मीदवार चयन का पूरा अधिकार राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को सौंप दिया है। वर्तमान में एडी सिंह और प्रेमचंद्र गुप्ता जैसे दिग्गज रिटायर हो रहे हैं। यदि तेजस्वी दिल्ली नहीं जाने का फैसला करते हैं, तो इन्हीं में से किसी एक को फिर से मौका मिल सकता है। हालांकि, पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा मानता है कि विपक्षी खेमे को एकजुट रखने के लिए तेजस्वी का नाम सबसे प्रभावी है।

जानिए कि दांव पर क्या है?
अगर तेजस्वी राज्यसभा जाते हैं, तो बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेतृत्व का वैक्यूम पैदा हो सकता है। लेकिन इसके बदले में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने और इंडिया गठबंधन (I.N.D.I.A.) में अपनी भूमिका विस्तार करने का मौका मिलेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि यह कदम एआईएमआईएम (AIMIM) और बसपा (BSP) जैसे दलों के विधायकों का समर्थन जुटाने में भी मददगार साबित हो सकता है।