न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार की सियासत में राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की शक्ति संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है। सभी पांच सीटों पर NDA की जीत ने न केवल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की स्थिति को मजबूत किया है, बल्कि तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन की आंतरिक दरारों को भी सार्वजनिक कर दिया है।
NDA की एकजुटता बनाम महागठबंधन का बिखराव
इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू NDA का ‘स्ट्राइक रेट’ रहा। भाजपा और जदयू ने न केवल अपने कैडर को एकजुट रखा, बल्कि निर्दलीय और छोटे दलों के समीकरणों को भी साधने में सफलता पाई।
शिवेश राम की जीत महज एक सीट की जीत नहीं है, बल्कि यह विपक्ष के मनोवैज्ञानिक दबाव को तोड़ने वाली जीत है।
भितरघात का शिकार विपक्ष : तेजस्वी यादव का यह स्वीकार करना कि “कुछ लोगों ने धोखा दिया”, महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी को दर्शाता है। राजद विधायक फैसल रहमान की अनुपस्थिति और अन्य विधायकों की संदिग्ध भूमिका ने ‘इंडिया गठबंधन’ की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
तेजस्वी यादव के लिए ‘दोहरा झटका’
विधानसभा चुनाव के बाद यह तेजस्वी यादव के लिए दूसरा बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। संख्या बल की विफलता: AIMIM के 5 और BSP के समर्थन के बावजूद महागठबंधन अपने प्रत्याशी ए.डी. सिंह को नहीं जिता सका। यह संकेत देता है कि तेजस्वी के पास फिलहाल वह ‘मैग्नेटिक पावर’ कम हो रही है जो असंतुष्ट विधायकों को एकजुट रख सके। हार के बाद ए.डी. सिंह और तेजस्वी द्वारा लगाए गए ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ और प्रशासन के दुरुपयोग के आरोप हार की हताशा को दर्शाते हैं, लेकिन यह हकीकत नहीं बदल सकते कि संख्या बल हाथ से फिसल चुका है।
उभरते समीकरण: दलित और पिछड़ा कार्ड
NDA ने अपने पांच प्रत्याशियों (नीतीश कुमार, रामनाथ ठाकुर, नितिन नवीन, शिवेश राम और उपेंद्र कुशवाहा) के जरिए बिहार के सोशल इंजीनियरिंग के गणित को पूरी तरह साध लिया है। शिवेश राम (दलित चेहरा) की जीत से भाजपा ने संदेश दिया है कि वह हाशिए के समाज को सत्ता के शीर्ष तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। उपेंद्र कुशवाहा और रामनाथ ठाकुर की मौजूदगी से लव-कुश और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) वोट बैंक पर NDA की पकड़ और मजबूत हुई है।
भविष्य की राह
बिहार की राजनीति अब एक नए मोड़ पर है। NDA जहां इस जीत के बाद आगामी चुनावों के लिए आत्मविश्वास से लबरेज है, वहीं महागठबंधन के लिए यह आत्ममंथन का समय है। यदि तेजस्वी यादव अपने कुनबे को एकजुट रखने में विफल रहते हैं, तो आने वाले समय में विपक्षी एकता केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी।
































