बिहार में शराबबंदी: नीति बनाम नीयत? चिराग पासवान ने भी उठाई समीक्षा की मांग, बढ़ता राजनीतिक दबाव

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून को लागू हुए आठ साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन इसकी सफलता को लेकर अब सत्ता पक्ष के भीतर से भी सुर बदलने लगे हैं। केंद्रीय मंत्री और लोजपा (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने शराबबंदी की ‘समीक्षा’ की मांग का समर्थन कर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। चिराग का यह बयान ऐसे समय में आया है जब जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर इस कानून को पूरी तरह विफल बताकर इसे खत्म करने की बात लगातार कहते रहे हैं।

क्या वाकई अपने उद्देश्यों में सफल रही शराबबंदी?
चिराग पासवान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी योजना की समय-समय पर समीक्षा अनिवार्य है। उनका तर्क है कि हमें यह जांचना होगा कि जिस लक्ष्य (महिला सुरक्षा और सामाजिक सुधार) के साथ यह प्रतिबंध लगाया गया था, क्या वह पूरा हो रहा है? चिराग ने उन गंभीर खामियों की ओर भी इशारा किया जो इस कानून की साख पर सवाल उठाती हैं:

ब्लैक मार्केटिंग और होम डिलीवरी: सीमावर्ती इलाकों से शराब की तस्करी और राज्य में धड़ल्ले से हो रही ‘होम डिलीवरी’ ने कानून के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े किए हैं।

राजस्व की हानि बनाम जहरीली शराब: समीक्षा की मांग के पीछे एक बड़ा कारण जहरीली शराब से होने वाली मौतें और राज्य को होने वाला भारी आर्थिक नुकसान भी है।

प्रशांत किशोर का प्रहार
शराबबंदी के मुद्दे पर सबसे तीखा हमला प्रशांत किशोर (PK) की ओर से आ रहा है। पीके लगातार कहते रहे हैं कि शराबबंदी केवल कागजों पर है, असल में बिहार में शराब की समांतर अर्थव्यवस्था (Parallel Economy) चल रही है।

उन्होंने कहा है कि अगर यह योजना इतनी ही सफल है तो इसे सिर्फ बिहार में क्यों पूरे देश में लागू कर देना चाहिए। प्रशांत कि तर्क है कि शराबबंदी खत्म करना चाहिए और मिलने वाले राजस्व का उपयोग बिहार की शिक्षा व्यवस्था सुधारने में लगाना चाहिए।

सत्ता और विपक्ष का बदलता रुख
विपक्ष (RJD) पहले से ही इसे ‘पुलिसिया लूट का जरिया’ बताता रहा है। अब चिराग पासवान जैसे सहयोगी दल के नेता द्वारा समीक्षा की बात करना मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए एक असहज स्थिति पैदा कर सकता है। चिराग का मानना है कि समीक्षा से ही पता चलेगा कि ‘लीकेज’ कहाँ है और क्या जनता को इसका वास्तविक लाभ मिल रहा है।