बिहार कैबिनेट में ‘जाति और सत्ता’ का समीकरण; बीजेपी का बढ़ता कद, नीतीश की वापसी का रोडमैप

नई सरकार का मंथन : बिहार कैबिनेट में वर्चस्व और संतुलन का दाँव, इस बार भाजपा के पास ज्यादा मंत्री पद रहेगा, चिराग भी ताकत के साथ रहेंगे
बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के शानदार चुनावी प्रदर्शन के बाद अब सरकार गठन पर गहन मंथन शुरू हो गया है। नई दिल्ली और पटना में बैठकों का दौर जारी है, जिसका केंद्र बिंदु है जातिगत संतुलन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, और गठबंधन के भीतर सत्ता का नया समीकरण। सूत्रों के अनुसार, इस बार के मंत्रिमंडल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का प्रभाव स्पष्ट रूप से अधिक होगा, जो गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।

सत्ता के केंद्र में बीजेपी : बढ़े हुए प्रभाव के संकेत
आंकड़ों के आधार पर बीजेपी (89 सीटें) ने जेडीयू (85 सीटें) से आगे निकलते हुए गठबंधन में अपनी स्थिति को मजबूत किया है। इस बढ़त का असर कैबिनेट के बंटवारे में दिख रहा है। चर्चा है कि बीजेपी 15 से 16 मंत्री पद अपने पास रखेगी, जो पिछली सरकारों की तुलना में एक बड़ा हिस्सा होगा।

इसके अलावा, लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी बिहार में दो उपमुख्यमंत्री बनाने की रणनीति पर विचार कर रही है। इसमें पूर्व डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को दोबारा मौका मिल सकता है, जबकि दूसरे पद के लिए एक ठाकुर चेहरे को आगे किया जा सकता है। यह कदम न सिर्फ क्षेत्रीय संतुलन बल्कि अगड़ी जातियों के बड़े हिस्से को साधने की बीजेपी की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) का पद भी बीजेपी के खाते में जाने की प्रबल संभावना है, जो विधायी प्रक्रिया पर उसके नियंत्रण को सुनिश्चित करेगा।

नीतीश कुमार : मुख्यमंत्री पद पर निर्विवाद सहमति
गठबंधन के चारों प्रमुख दल—जेडीयू, बीजेपी, राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM)—एकमत हैं कि जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभालें। यह सहमति स्थिरता बनाए रखने और गठबंधन के पुराने चेहरे पर भरोसा जताने का संकेत है। हालांकि, जेडीयू को भी संख्याबल के आधार पर 14 से 15 मंत्री पद मिलने की उम्मीद है, लेकिन महत्वपूर्ण वित्त, गृह और लोक निर्माण विभाग जैसे मलाईदार पोर्टफोलियो पर इस बार बीजेपी की पैनी नजर है।

सहयोगी दलों का समायोजन और राजनीतिक मजबूरी
गठबंधन को विशाल बहुमत (202 सीटें) दिलाने में सहयोगी दलों की भूमिका भी अहम रही है, और इसलिए उन्हें समायोजित करना आवश्यक है। चिराग पासवान की एलजेपी (राम विलास): 19 सीटों के साथ मजबूत बनकर उभरी चिराग पासवान की पार्टी को तीन से चार मंत्री पद मिलने की संभावना है। पार्टी उपमुख्यमंत्री का पद भी मांग रही है, जो गठबंधन के लिए एक अतिरिक्त चुनौती हो सकती है। उपमुख्यमंत्री नहीं मिलने की स्थिति में अतिरिक्त मंत्री पद पर दावा होगा।

छोटे सहयोगी : उपेंद्र कुशवाहा की RLM (4 सीटें) और जीतन राम मांझी की HAM (5 सीटें) को एक-एक मंत्री पद से संतुष्ट होना पड़ सकता है। इसमें भी उनके परिवार के सदस्यों (जैसे मांझी के बेटे और कुशवाहा की पत्नी) को मंत्री बनाने की अटकलें हैं, जो वंशवाद और राजनीतिक निष्ठा के संतुलन को दर्शाती हैं।

यह पूरा मंथन दर्शाता है कि नई बिहार सरकार का गठन सिर्फ सीटों के बंटवारे का नहीं, बल्कि जातीय समीकरणों को साधने, क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूरा करने और 2029 के बड़े चुनावों से पहले गठबंधन के भीतर बीजेपी के राजनीतिक वर्चस्व को स्थापित करने का एक सूक्ष्म प्रयास है। सरकार गठन की प्रक्रिया को 22 नवंबर से पहले पूरा करने की उम्मीद है।