बिहार कांग्रेस में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’; आलाकमान ने छीनी प्रदेश नेतृत्व की ताकत, अब सीधे दिल्ली से तय होंगे जमीनी सिपाही

हाल के चुनावों में शर्मनाक प्रदर्शन और राज्यसभा चुनाव के दौरान विधायकों की खुली बगावत ने कांग्रेस आलाकमान को एक कड़ा फैसला लेने पर मजबूर कर दिया है। बिहार कांग्रेस में अब वह दौर खत्म होता दिख रहा है जहां प्रदेश अध्यक्ष या स्थानीय क्षत्रपों की मर्जी से नियुक्तियां होती थीं। ‘संगठन सृजन अभियान’ के तहत अब पार्टी के सबसे निचले और महत्वपूर्ण स्तंभ, प्रखंड अध्यक्षों की नियुक्ति का रिमोट कंट्रोल भी सीधे दिल्ली ने अपने हाथ में ले लिया है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, नई दिल्ली/पटना
स्पष्ट है कि केंद्रीय नेतृत्व अब प्रदेश स्तर के नेताओं पर भरोसा करने के मूड में नहीं है। जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में जिस तरह प्रदेश अध्यक्ष की राय को दरकिनार किया गया, वही पैटर्न अब प्रखंड स्तर पर भी दोहराया जा रहा है। इसके पीछे तीन मुख्य कारक नजर आते हैं :-
अनुशासनहीनता का घाव: राज्यसभा चुनाव में जिस तरह महागठबंधन के अधिकृत उम्मीदवारों को दरकिनार कर कांग्रेस विधायकों ने ‘क्रॉस-वोटिंग’ की, उसने दिल्ली में बैठे नेताओं को यह संदेश दे दिया कि प्रदेश नेतृत्व का अपने कैडर पर कोई नियंत्रण नहीं है।
गुटबाजी का अंत: स्थानीय स्तर पर नियुक्तियां अक्सर ‘पैरवी’ और ‘गुटबाजी’ की भेंट चढ़ जाती थीं। केंद्रीय पर्यवेक्षकों को सीधे जिलों में भेजकर आलाकमान इस ‘सिंडिकेट’ को तोड़ना चाहता है।
अतिपिछड़ा (EBC) कार्ड: पार्टी के भीतर यह गंभीर शिकायत थी कि संगठन में अतिपिछड़ों को वाजिब हक नहीं मिल रहा है। अब दिल्ली खुद इस सामाजिक समीकरण को साधने के लिए जिलों की संख्या 53 से बढ़ाकर 60 करने और वहां वंचित वर्गों को जगह देने पर विचार कर रही है।

बाहरी ‘निरीक्षकों’ के हाथ में भविष्य की कमान
कांग्रेस ने इस बार रणनीति बदली है। प्रखंड अध्यक्षों के चयन के लिए दिल्ली या अन्य राज्यों के कद्दावर नेताओं को बतौर पर्यवेक्षक तैनात किया गया है। ये पर्यवेक्षक स्थानीय नेताओं से संपर्क किए बिना सीधे जिलों में जाकर फीडबैक ले रहे हैं।
प्रोफाइलिंग: उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता और सामाजिक आधार की बारीकी से जांच हो रही है।
क्लीन इमेज: ‘बैक हिस्ट्री’ खंगाली जा रही है ताकि भविष्य में कोई अपराधी या पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल व्यक्ति संगठन का हिस्सा न बन सके।

क्या यह ‘बॉटम-अप’ मॉडल काम करेगा?
कांग्रेस का यह दांव भविष्य के लिए ‘सेकंड लाइन लीडरशिप’ तैयार करने की एक कोशिश है। जब प्रखंड स्तर का अध्यक्ष सीधे केंद्रीय पर्यवेक्षक के जरिए चुना जाएगा, तो उसकी वफादारी स्थानीय गुटों के बजाय सीधे पार्टी की विचारधारा और आलाकमान के प्रति होगी। हालांकि, यह रास्ता कांटों भरा भी है। यदि प्रदेश के स्थापित नेता खुद को इस प्रक्रिया से पूरी तरह कटा हुआ महसूस करेंगे, तो सांगठनिक स्तर पर आंतरिक कलह बढ़ने का खतरा भी बना रहेगा। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, आलाकमान के पास संगठन को ‘रीबूट’ करने के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं था।