लालू की ‘माई’ से तेजस्वी की ‘ए टू जेड’ : क्या राजद अपनी जड़ों से दूर हो रही है? इस बार न दही चूड़ा, न होली मिलन और अब तो इफ्तार पार्टी से भी तौबा!

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार की राजनीति में पिछले कुछ महीनों में एक खामोश लेकिन बड़ा बदलाव दिखा है। यह बदलाव नारों में नहीं, बल्कि राजद (RJD) के नए मुखिया तेजस्वी यादव के व्यवहार और पार्टी के पारंपरिक आयोजनों में दिख रहा है। जिस राजद की पहचान ‘दही-चूड़ा’, ‘होली मिलन’ और भव्य ‘इफ्तार पार्टियों’ से होती थी, वहां अब सन्नाटा है।

परंपराओं से किनारा: महज इत्तेफाक या सोची-समझी रणनीति?
राजद के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब एक ही कैलेंडर वर्ष में तेजस्वी यादव ने न तो दही-चूड़ा का भोज दिया, न होली मिलन समारोह आयोजित किया और न ही इस बार ‘दावत-ए-इफ्तार’ की महफिल सजी।

इमारत-ए-शरिया से दूरी: रमजान के दौरान पटना में मौजूद रहने के बावजूद तेजस्वी का फुलवारीशरीफ स्थित इमारत-ए-शरिया न जाना सबसे ज्यादा चौंकाने वाला रहा। लालू प्रसाद यादव के दौर में यह एक अनिवार्य राजनीतिक रस्म थी, जहाँ वे खुद जाकर अल्पसंख्यकों के बीच अपनी पैठ मजबूत करते थे।

स्पष्ट है कि तेजस्वी अपने पिता लालू यादव के ‘प्योर सेक्युलरिज्म’ वाले पारंपरिक रास्ते से अलग, एक नई राह तलाश रहे हैं।

‘ए टू जेड’ बनाम ‘मुस्लिम-यादव’ समीकरण
तेजस्वी बार-बार पार्टी को ‘ए टू जेड’ (हर वर्ग की पार्टी) बनाने की बात करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस प्रक्रिया में वे अपने सबसे वफादार ‘मुस्लिम’ वोट बैंक को हल्के में ले रहे हैं?

अल्पसंख्यक समाज की दुविधा: राजद का कोर वोटर हमेशा से मुस्लिम समाज रहा है। इफ्तार और इमारत-ए-शरिया से दूरी इस समाज के भीतर यह संदेश भेज सकती है कि राजद अब उन्हें ‘ग्रान्टेड’ (Granted) ले रही है या भाजपा के ‘तुष्टिकरण’ वाले आरोपों से बचने के लिए रक्षात्मक मुद्रा में है।

भविष्य पर असर: यदि मुस्लिम मतदाता खुद को उपेक्षित महसूस करता है, तो ओवैसी की एआईएमआईएम (AIMIM) जैसे विकल्प बिहार में और मजबूत हो सकते हैं, जो अंततः राजद की चुनावी गणित बिगाड़ देगा।

कमजोर संगठन और विजन की कमी
रिपोर्ट्स बताती हैं कि राजद फिलहाल संगठन के स्तर पर उतनी आक्रामक नजर नहीं आ रही जितनी सत्ता विरोधी लहर पैदा करने के लिए जरूरी है।

प्रभाव बढ़ाने की योजना: आम लोगों के बीच प्रभाव बढ़ाने की कोई ठोस जमीनी योजना फिलहाल धरातल पर नहीं दिख रही है। पार्टी की तरफ से मीडिया में भी इस तरह का कुछ नहीं देखने को मिल रहा है जिससे तेजस्वी की कोई खास रणनीति पता चलती हो।

राजनीतिक दिशा: क्या तेजस्वी ‘प्रो-हिंदू’ दिखने की कोशिश में अपनी मूल पहचान खो रहे हैं? यदि राजद न तो सवर्णों को पूरी तरह लुभा पाती है और न ही अपने पुराने वोट बैंक को संजो पाती है, तो पार्टी ‘त्रिशंकु’ स्थिति में फंस सकती है।

जोखिम भरा दांव
तेजस्वी यादव युवा हैं और वे पार्टी को ‘लालू युग’ के टैग (जैसे जंगलराज के आरोप या जातीय तनाव) से बाहर निकालना चाहते हैं। इफ्तार और धार्मिक प्रतीकों से दूरी बनाकर वे शायद खुद को एक ‘विकासवादी और समावेशी’ नेता के रूप में पेश करना चाहते हैं। लेकिन राजनीति में अपनी ‘नींव’ छोड़कर ‘आसमान’ छूने की कोशिश अक्सर जोखिम भरी होती है। राजद अगर पहले से कमजोर है, तो उसे प्रतीकों की नहीं, बल्कि ठोस सांगठनिक कार्यक्रमों की जरूरत है।