मांझी के ‘वचन’ की राजनीति… बिहार NDA में फिर सुलग रही है असंतोष की चिंगारी?

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार की राजनीति में ‘अपनों’ की नाराजगी और पुराने ‘वादों’ को याद दिलाने का सिलसिला एक बार फिर शुरू हो गया है। केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के संरक्षक जीतनराम मांझी के एक ताजा बयान ने राज्य के सियासी गलियारे में हलचल तेज कर दी है। मांझी ने राज्यसभा सीट को लेकर भाजपा को उसके ‘वचन’ की याद दिलाई है, जिससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या एनडीए के भीतर सीटों के तालमेल को लेकर कोई आंतरिक खींचतान चल रही है?

‘मांगेंगे नहीं, पर याद दिलाएंगे’: मांझी का नया दांव
जीतनराम मांझी का ताजा बयान उनकी सधी हुई लेकिन आक्रामक रणनीति का हिस्सा है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए स्पष्ट किया :-

अधूरा वादा: मांझी के अनुसार, चुनाव पूर्व गठबंधन की शर्तों में उन्हें दो लोकसभा और एक राज्यसभा सीट का आश्वासन दिया गया था, लेकिन उन्हें केवल एक लोकसभा सीट मिली।

नैतिक दबाव: उन्होंने कहा, “मैं राज्यसभा सीट मांगूंगा नहीं, लेकिन भाजपा को अपने वादे पर विचार करना चाहिए। उन्होंने वचन दिया था, तो उन्हें सोचना चाहिए।”

गठबंधन धर्म: हालांकि, उन्होंने किसी भी तरह की नाराजगी से इनकार करते हुए कहा कि वे गठबंधन धर्म का पालन करते रहेंगे, लेकिन अपनी बात कहना बंद नहीं करेंगे।

जब मांझी के ‘तेवरों’ ने बढ़ाई थी NDA की धड़कन
यह पहली बार नहीं है जब मांझी ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए सार्वजनिक मंच का उपयोग किया हो। यदि हम चुनाव के समय के उनके बयानों पर गौर करें, तो एक पैटर्न साफ नजर आता है:

पुत्र को नसीहत या एनडीए को चेतावनी?: चुनाव के दौरान मांझी ने सार्वजनिक मंच से अपने बेटे (संतोष कुमार सुमन) का नाम लेकर कहा था कि अपनी ताकत पहचानो। उनका स्पष्ट मानना था कि “बिना मांगे और अपनी स्थिति मजबूत किए कुछ मिलता नहीं है।”

सीटों पर सीधा दावा: टिकट बंटवारे के समय भी मांझी ने गया और औरंगाबाद की सीटों पर अपना कड़ा दावा ठोका था। उन्होंने साफ कहा था कि महादलित वोट बैंक की चाबी उनके पास है और उन्हें नजरअंदाज करना एनडीए को ‘भारी पड़ेगा’।

मंत्री पद का मोह: एक अभिनंदन समारोह में उन्होंने अपने ही बेटे को फटकार लगाते हुए कहा था कि “मंत्री पद का मोह छोड़ना होगा”। यह दरअसल सहयोगियों को संदेश था कि वे सत्ता के लिए अपनी वैचारिक पहचान और पार्टी के वजूद से समझौता नहीं करेंगे।

आखिर मांझी चाहते क्या हैं?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि मांझी का यह ‘वचन विलाप’ केवल एक राज्यसभा सीट के लिए नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक बिसात बिछी है। मांझी अपनी ‘बार्गेनिंग पावर’ को कम नहीं होने देना चाहते। दलित और महादलित वोटों के बड़े चेहरे के रूप में वे भाजपा को अपनी अपरिहार्यता का अहसास करा रहे हैं। चिराग पासवान और नीतीश कुमार के बीच अपनी पार्टी ‘HAM’ को एक मजबूत तीसरे स्तंभ के रूप में स्थापित करना उनका मुख्य लक्ष्य है।

भाजपा के लिए ‘डिप्लोमैटिक प्रेशर टेस्ट’
जीतनराम मांझी ने बड़ी चतुराई से गेंद भाजपा के पाले में डाल दी है। “नाराजगी नहीं है” कहकर उन्होंने बगावत के रास्ते बंद रखे हैं, लेकिन “वादा याद है” कहकर उन्होंने नैतिक और राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया है।

स्पष्ट है कि बिहार एनडीए में सीटों का पेच अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है। मांझी का इतिहास गवाह है कि वे गठबंधन में रहते हुए भी अपनी शर्तों पर राजनीति करना जानते हैं। अब देखना यह है कि भाजपा अपने इस पुराने सहयोगी के ‘वचन’ को कितनी गंभीरता से लेती है।