लोकतंत्र केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह परंपराओं, शुचिता और संस्थागत सम्मान की नींव पर टिका होता है। लेकिन हाल के दिनों में बिहार की राजनीति ने जो मंजर देखा, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे रसूखदार राजनेता खुद को संवैधानिक संस्थाओं से भी ऊपर मानने लगे हैं? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे की प्रक्रिया ने संसदीय मर्यादा के उन सुनहरे पन्नों पर स्याही पोत दी है, जिन्हें पीढ़ियों से संजोया गया था।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र ने इस घटनाक्रम पर तीखा प्रहार करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि यह दिन राजनीति शास्त्र के छात्रों के लिए एक बड़ा अवसर था, जहाँ वे देख सकते थे कि बड़े राजनेता संकट या परिवर्तन के समय कैसा आचरण करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नीतीश कुमार और नितिन नवीन, दोनों का ही इस्तीफा देने का तरीका यह दर्शाता है कि उनके व्यक्तिगत कद के सामने सदन और उसके प्रमुखों की गरिमा छोटी पड़ गई है।
पुष्यमित्र लिखते हैं, “दोनों ने अपने प्रतिनिधियों के हाथों इस्तीफा भिजवाया। नीतीश ने संजय गांधी को भेजा तो नितिन ने संजय सरावगी को। क्या वे खुद नहीं जा सकते थे? जाना चाहिए था। नितिन नवीन के मामले में तो पराकाष्ठा हो गई—विधानसभा अध्यक्ष दिल्ली से भागते हुए पटना आए, प्रेम कुमार अपने दफ्तर में इंतजार करते रहे, लेकिन माननीय एक सभा में व्यस्त थे। वहीं, मुख्यमंत्री के मामले में तो विधान परिषद के अध्यक्ष को खुद उनके दरवाजे तक जाना पड़ा। क्या लोकतंत्र के पहरुओं को यह शोभा देता है?”
‘प्रतिनिधि’ नहीं, ‘अहंकार’ की राजनीति
संसदीय परंपराओं में इस्तीफा देना केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस सदन के प्रति अपना सम्मान प्रकट करना होता है जिसने आपको जनता की सेवा का अधिकार दिया। जब एक विधायक या विधान पार्षद सदन की सदस्यता छोड़ता है, तो परंपरा रही है कि वह स्वयं अध्यक्ष के समक्ष उपस्थित होकर अपना त्यागपत्र सौंपे।
क्या ‘व्यस्तता’ संविधान से बड़ी है?
नितिन नवीन का एक सभा के लिए विधानसभा अध्यक्ष को प्रतीक्षारत छोड़ देना केवल एक व्यक्ति का अनादर नहीं, बल्कि उस ‘आसन’ का अनादर है जो लोकतंत्र की सर्वोच्च इकाई है। यदि इस्तीफा किसी प्रतिनिधि के हाथ ही भेजना था, तो अध्यक्ष को दिल्ली से बुलाने और कार्यालय में बिठाए रखने का औचित्य क्या था? यह प्रशासनिक और नैतिक, दोनों मोर्चों पर एक बड़ी चूक है।
संस्थागत गरिमा बनाम व्यक्तिगत प्रभाव
नीतीश कुमार जैसे अनुभवी राजनेता, जो दशकों से संसदीय मूल्यों की दुहाई देते रहे हैं, उनके मामले में विधान परिषद के सभापति का स्वयं उनके आवास जाना एक गलत नजीर पेश करता है। यह संदेश जाता है कि सत्ता के गलियारों में ‘पद’ नहीं, बल्कि ‘व्यक्ति’ की हैसियत तय करती है कि नियम क्या होंगे।
लोकतंत्र की ‘वीआईपी’ संस्कृति का खतरा
संविधान कहता है कि सदन के भीतर हर सदस्य बराबर है और अध्यक्ष सबसे ऊपर। लेकिन प्रतिनिधियों के जरिए इस्तीफा भेजकर इन नेताओं ने यह जताने की कोशिश की है कि वे सदन की चौखट तक जाने की “जहमत” नहीं उठा सकते। यह ‘रिमोट कंट्रोल’ वाली राजनीति लोकतांत्रिक संस्थाओं को खोखला कर रही है।
परंपराओं को बचाने की जिम्मेदारी किसकी?
अगर लोकतंत्र की रक्षक कही जाने वाली संस्थाओं (विधायिका) के प्रमुखों को इन दिग्गज नेताओं के सामने ‘अटेंडेंट’ की तरह व्यवहार करना पड़े, तो आम आदमी का व्यवस्था पर से भरोसा डगमगाना लाजमी है। राजनीति में चेहरे बदलते रहते हैं, पद आते-जाते हैं, लेकिन जो बचती है, वो है ‘परंपरा’।
नीतीश कुमार और नितिन नवीन को यह सोचना होगा कि क्या वे आने वाली पीढ़ी को एक ऐसी राजनीति सौंपना चाहते हैं जहाँ संस्थाएं सिर्फ प्रतीकात्मक रह जाएं और राजनेताओं का अहंकार सर्वोपरि हो? लोकतंत्र की गरिमा तभी बचेगी जब नेता खुद को सदन का सेवक समझेंगे, उसका स्वामी नहीं।































