
राजनीति में ‘मसीहा’ बनने और ‘माफिया’ की तरह काम करने के बीच एक बहुत महीन लकीर होती है, जिसे बिहार की सत्ता ने दशकों तक धुंधला किया है। लेकिन दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने ‘नौकरी के बदले जमीन’ घोटाले में जो टिप्पणी की है, उसने उस धुंध को साफ कर दिया है। अदालत ने लालू परिवार के कुनबे पर आरोप तय करते हुए जिस ‘क्रिमिनल सिंडिकेट’ शब्द का इस्तेमाल किया है, वह सिर्फ कानूनी शब्दावली नहीं है… यह सामाजिक न्याय के नाम पर किए गए उस विश्वासघात का प्रमाण है, जिसकी जड़ें अब बिहार की मिट्टी में गहरे तक धंस चुकी हैं।
‘सिंडिकेट’, यानी भ्रष्टाचार की कॉर्पोरेट इंजीनियरिंग
अदालत ने इसे सामान्य चोरी नहीं माना है। एक ‘गैंग’ और ‘सिंडिकेट’ के बीच का फर्क समझना जरूरी है। गैंग सड़कों पर कट्टे लहराता है, लेकिन सिंडिकेट बंद कमरों में बैठकर ‘सिस्टम’ का गला घोंटता है। अदालत की टिप्पणी का सीधा मतलब यह है कि यह घोटाला कोई इत्तेफाक नहीं था। यह एक सोची-समझी ‘बिजनेस डील’ थी। एक तरफ से बेरोजगार नौजवानों की मजबूरी को मशीन में डाला गया और दूसरी तरफ से लालू परिवार के नाम जमीनों की रजिस्ट्री निकली। जब सत्ता ‘लोक सेवा’ के बजाय ‘रियल एस्टेट’ का धंधा बन जाए, तो उसे अदालत ‘सिंडिकेट’ ही कहेगी।
90 के दशक में नारा था… ‘स्वर दिया, सम्मान दिया’। बिहार के पिछड़ों और वंचितों ने लालू यादव को अपनी आवाज बनाया था। लेकिन आज उसी आवाज के बदले उनकी जमीनें लिखवा ली गईं। क्या यही वह सामाजिक न्याय था जिसका सपना कर्पूरी ठाकुर ने देखा था? अदालत ने जब 41 आरोपियों पर, जिसमें तेजस्वी यादव भी शामिल हैं, आरोप तय किए हैं, तो यह आरजेडी की नई पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा नैतिक संकट है। आप ‘ए टू जेड’ की राजनीति की बात करते हैं, लेकिन कोर्ट की चार्जशीट तो ‘जमीन से लेकर जेल’ तक की बात कर रही है। अब ‘विक्टिम कार्ड’ और ‘राजनैतिक साजिश’ के पुराने राग से जनता को और अधिक बरगलाया नहीं जा सकता। जब कोर्ट ‘प्रथम दृष्टया साक्ष्य’ की बात करता है, तो इसका मतलब है कि धुआं वहीं से उठ रहा है जहाँ आग लगी हुई है।
युवराज की साख पर लगा ‘सिंडिकेट’ का ठप्पा
तेजस्वी यादव खुद को बिहार के भविष्य के रूप में पेश करते हैं। लेकिन जब उन पर ‘आपराधिक सिंडिकेट’ का हिस्सा होने का आरोप अदालत तय करती है, तो उनकी पूरी राजनीति पर सवालिया निशान लग जाता है। यह मामला अब केवल चुनावी रैलियों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उस ‘इमेज’ का दिवालियापन है जिसे गढ़ने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए। मेरा सीधा सवाल है, क्या बिहार की जनता का भाग्य सिर्फ इन ‘सिंडिकेट्स’ के हाथों में बंधा रहेगा? या फिर कभी उस ‘खाली कुर्सी’ पर कोई ऐसा व्यक्ति भी बैठेगा जिसकी भूख जमीनों से नहीं, बल्कि बिहार के विकास से मिटेगी? सोचिएगा जरूर क्योंकि आपकी चुप्पी की वजह से ही इस तरह के सिंडिकेट पैदा होते हैं। इस तरह के सिंडिकेट को सिर्फ पैदा होने से नहीं रोकना है, बल्कि संहार भी सुनिश्चित करना है। आपकी जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है।
अदालत का फैसला जो भी आए, लेकिन ‘सिंडिकेट’ शब्द ने लालू परिवार की राजनीति पर जो कालिख पोती है, उसे धोने के लिए सालों की तपस्या भी कम पड़ेगी।


























