न्यूज स्कैन ब्यूरो, सुपौल
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जिला शाखा ने आंदोलन की चेतावनी दी है। बुधवार को स्थानीय धताल दास ठाकुरवाडी, सुपौल में विश्वविद्यालय से जुड़े हालिया घटनाक्रम एवं पीएम-उषा फंड के उपयोग को लेकर एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। प्रेस वार्ता में परिषद के कार्यकर्ताओं ने भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा में शिक्षा के नाम पर हो रही कथित विवादित, मनमानी एवं असंवैधानिक गतिविधियों पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई।
एबीवीपी सुपौल ने स्पष्ट रूप से कहा कि पीएम-उषा जैसी केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, शोध एवं बुनियादी ढांचे को सशक्त करना है, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा इसके क्रियान्वयन में शैक्षणिक मर्यादा, पारदर्शिता और विषयगत संतुलन का पालन नहीं किया जा रहा है। परिषद ने आरोप लगाया कि सेमिनार एवं कार्यक्रमों के आयोजन, विदेशी वक्ताओं के चयन, विभागीय जिम्मेदारियों के निर्धारण तथा प्रशासनिक पदों पर बैठे विभागाध्यक्षों की भूमिका संदेह के घेरे में है।
प्रेस वार्ता के दौरान एबीवीपी ने विश्वविद्यालय प्रशासन की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए चेतावनी दी कि यदि शीघ्र सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
प्रेस वार्ता में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रांत सह मंत्री शिवजी कुमार ने कहा कि बीएनएमयू एक शैक्षणिक संस्थान है, जहां शिक्षा, शोध और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विचारों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। विश्वविद्यालय परिसर को किसी भी प्रकार के वैचारिक, धार्मिक या बाहरी एजेंडे का मंच बनाना छात्र हितों के साथ सीधा खिलवाड़ है। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाता है, तो एबीवीपी सुपौल छात्र समाज के साथ मिलकर निर्णायक और उग्र आंदोलन करने को बाध्य होगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी। प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य रंजीत झा
ने कहा कि पीएम-उषा योजना का उद्देश्य उच्च शिक्षा को मजबूत करना है, लेकिन विश्वविद्यालय में जिस तरह से इस फंड का उपयोग किया जा रहा है, वह गंभीर सवाल खड़े करता है। कोर कमिटी से लेकर कार्यक्रमों की रूपरेखा तक पारदर्शिता का अभाव दिखाई देता है। प्रशासन को तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए।
जिला संयोजक राजेश कुमार ने कहा कि“सेमिनार या अकादमिक कार्यक्रम जिस विषय एवं विभाग से संबंधित हों, उनकी जिम्मेदारी उसी विभाग को देना विश्वविद्यालयी परंपरा का मूल सिद्धांत है। इसके विपरीत निर्णय विश्वविद्यालय की शैक्षणिक विश्वसनीयता को कमजोर करता है। साथ ही प्रमाण-पत्र शुल्क में की गई बेतहाशा वृद्धि छात्रों के हितों के खिलाफ है, जिसे अविलंब वापस लिया जाना चाहिए।”
परिषद ने दो टूक शब्दों में कहा कि
“विश्वविद्यालय शिक्षा का केंद्र है, किसी एजेंडे या मनमानी निर्णयों का नहीं। पीएम-उषा जैसी योजना के नाम पर यदि शैक्षणिक मूल्यों से समझौता किया गया, तो इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
एबीवीपी की 8 सूत्री मुख्य मांगें पीएम-उषा के अंतर्गत गठित कोर कमिटी का पुनर्गठन करने,
भारत विरोधी मानसिकता वाले विदेशी वक्ताओं को आमंत्रित करने वालों पर सख्त कार्रवाई करने, सेमिनार एवं अकादमिक कार्यक्रमों की जिम्मेदारी विषय से संबंधित विभागों को ही दी जाए,विभागाध्यक्षों को अतिरिक्त प्रशासनिक पदों से मुक्त किरने, छात्रों पर थोपे गए प्रमाण-पत्र शुल्क में की गई वृद्धि को तत्काल वापस लेने, विश्वविद्यालय के लीगल सेल में नियमित नियुक्ति सुनिश्चित की जाए, विश्वविद्यालय के सभी प्रशासनिक एवं अकादमिक कार्यों को समर्थ पोर्टल के माध्यम से संचालित किया जाए, पीएम-उषा सहित अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन में पूर्ण पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
परिषद ने अंत में स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि इन मांगों पर शीघ्र ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो छात्र आंदोलन को चरणबद्ध रूप से और तेज किया जाएगा। फिलहाल इस पूरे मामले पर विश्वविद्यालय प्रशासन के रुख को लेकर छात्र समुदाय एवं शैक्षणिक जगत की निगाहें टिकी हुई हैं।

































