बिहार में ‘बड़े भाई’ की भूमिका का अंत : नीतीश मुख्यमंत्री जरूर, पर ‘पावर सेंटर’ बदला; समझिए बीजेपी का ‘मिशन 2030’

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे और उसके बाद सरकार का गठन सामान्य घटना नहीं है। 2005 से लेकर अब तक, यह पहला मौका है जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर तो हैं, लेकिन ‘इकबाल’ और ‘लाठी’ (गृह मंत्रालय) दोनों बीजेपी के हाथ में है। राजनीतिक जानकारों और मीडिया रिपोर्ट्स का विश्लेषण करें तो साफ दिखता है कि बीजेपी ने इस बार चुनाव लड़ने से लेकर सरकार बनाने तक, एक दीर्घकालीन ‘कोल्ड स्ट्रेटेजी’ पर काम किया है, जिसका अंतिम लक्ष्य 2025 नहीं, बल्कि 2030 है।

  1. सीएम फेस पर ‘सन्नाटा’ बीजेपी की सोची-समझी रणनीति थी। चुनाव प्रचार के दौरान विपक्ष बार-बार पूछता रहा- “दूल्हा कौन है?” बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने नीतीश कुमार के नाम पर हामी तो भरी, लेकिन प्रचार सामग्री और भाषणों में ‘मोदी की गारंटी’ को नीतीश के चेहरे से बड़ा रखा गया। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बीजेपी ने जानबूझकर ‘सीएम फेस’ पर बहुत आक्रामक कैंपेन नहीं किया। इसके पीछे दो मकसद थे, पहला, नीतीश कुमार की ‘एंटी-इनकंबेंसी’ का असर बीजेपी के वोट बैंक पर न पड़े। दूसरा, चुनाव बाद अगर बीजेपी की सीटें जेडीयू से बहुत ज्यादा आती हैं (जो कि हुआ), तो मोलभाव की गुंजाइश बनी रहे। बीजेपी ने नीतीश को ‘चेहरा’ बनाकर चुनाव निकाला, लेकिन ‘वोट’ अपने सिंबल और मोदी के नाम पर मांगे।
  2. गृह मंत्रालय, सिर्फ एक विभाग नहीं, ‘सत्ता का हस्तांतरण’ है। बिहार की राजनीति में कहावत है- “जिसके पास गृह, उसी का बिहार।” पिछले 20 सालों में चाहे आरजेडी के साथ सरकार रही हो या बीजेपी के साथ, नीतीश कुमार ने कभी गृह विभाग नहीं छोड़ा। बदला हुआ समीकरण यह है कि पहली बार गृह विभाग सम्राट चौधरी (बीजेपी) के पास है। इसका सीधा मतलब है कि थाने से लेकर एसपी ऑफिस तक की ‘रिपोर्टिंग’ अब सीएम आवास के बजाय डिप्टी सीएम के पास होगी। यह फैसला आरजेडी के ‘एम-वाई’ (MY) समीकरण के खिलाफ बीजेपी के ‘लव-कुश’ समीकरण को प्रशासनिक ताकत देने वाला है। बीजेपी अब अपने तरीके से लॉ एंड ऑर्डर को हैंडल कर अपनी छवि ‘कड़क प्रशासक’ की बनाएगी, जिसकी तैयारी 2030 के लिए है।
  3. सम्राट चौधरी बीजेपी के ‘फ्यूचर सीएम’ प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं। सम्राट चौधरी को गृह मंत्रालय देना महज संयोग नहीं है। जान लीजिए कि बीजेपी उन्हें अगले 5 सालों में एक ‘मास लीडर’ के तौर पर स्थापित करना चाहती है। बीजेपी जानती है कि लालू यादव के कोर वोटबैंक को तोड़ने के लिए उन्हें एक पिछड़ा चेहरा चाहिए, जो आक्रामक हो। गृह मंत्री के तौर पर सम्राट चौधरी के पास अब वो ‘पावर’ है जिससे वे अपने समाज और समर्थकों के बीच यह संदेश दे सकें कि असली ताकत अब उनके पास है। यह 2030 में बीजेपी के ‘अपने दम पर’ सीएम बनाने की रिहर्सल है।
  4. वित्त विभाग जेडीयू को तो एक ‘संत्वना पुरस्कार’ जैसा है। जेडीयू के वरिष्ठ मंत्री विजेंद्र यादव को वित्त विभाग देना एक संतुलन बनाने की कोशिश है, लेकिन विश्लेषकों की राय में यह ‘गृह मंत्रालय’ की भरपाई नहीं है। वित्त विभाग में केंद्रीय योजनाओं और जीएसटी के नियमों का दखल ज्यादा होता है, जबकि गृह विभाग का असर सीधे जनता और वोटरों पर पड़ता है। बीजेपी ने ‘खजाना’ देकर ‘ताकत’ अपने पास रख ली है।

यानी आप यह समझ लीजिए कि 2025 तो झांकी है, 2030 असली बाकी है। कुल मिलाकर, नई सरकार का स्वरूप बताता है कि नीतीश कुमार अब ‘गार्जियन’ की भूमिका में हैं, लेकिन ‘एग्जीक्यूशन’ बीजेपी के हाथों में चला गया है। बीजेपी ने बहुत ही शालीनता से बिहार में ‘सत्ता का हस्तांतरण’ (Power Transfer) शुरू कर दिया है। अगले 5 साल बिहार में बीजेपी के संगठनात्मक विस्तार और सम्राट चौधरी के ‘चेहरा’ बनने की यात्रा होगी, ताकि 2030 में नीतीश कुमार के बिना भी बीजेपी पूर्ण बहुमत की सरकार बना सके।