बिहार की राजनीति उस मुहाने पर खड़ी है, जहां से दशकों पुराना एक अध्याय समाप्त होने जा रहा है और एक नए युग की इबारत लिखी जा रही है। 9 अप्रैल को दिल्ली में होने वाली जनता दल यूनाइटेड (JDU) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक महज एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि बिहार के ‘सुशासन बाबू’ नीतीश कुमार के आखिरी दांव की बिसात है। चर्चा है कि इस बैठक के बाद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से अपने इस्तीफे का ऐतिहासिक ऐलान कर सकते हैं। यह कोई साधारण इस्तीफा नहीं होगा, बल्कि इसके पीछे एक ऐसी ‘पावर स्क्रिप्ट’ तैयार की गई है जिसमें उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीतिक लॉन्चिंग और भाजपा के सम्राट चौधरी का राजतिलक, दोनों ही बड़ी बारीकी से बुने गए हैं।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
कहानी शुरू होती है नीतीश कुमार की उस महत्वाकांक्षा से, जहां वे अपने उत्तराधिकार की रेखा खींचना चाहते हैं। जेडीयू के भीतर अब यह बात दबी जुबान में नहीं, बल्कि खुलकर चर्चा में है कि 9 अप्रैल को दिल्ली के ‘दरबार’ में नीतीश अपनी विरासत निशांत कुमार के हाथों में सौंपने का प्रस्ताव रख सकते हैं। कयासों का बाजार गर्म है कि निशांत कुमार को सीधे उपमुख्यमंत्री की कुर्सी दी जा सकती है या फिर उन्हें कैबिनेट में शामिल कर संगठन की पूरी कमान सौंप दी जाएगी। नीतीश चाहते हैं कि उनके राजनीतिक संन्यास से पहले निशांत न केवल सरकार, बल्कि पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच भी अपनी जड़ें मजबूत कर लें। परिवारवाद का विरोध करने वाले नीतीश कुमार की यह इच्छा अब सार्वजनिक हो चुकी है।
सम्राट चौधरी: बीजेपी का ‘मिशन सीएम’
दूसरी ओर, इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू सम्राट चौधरी का बढ़ता कद है। हाल ही में उन्हें बंगाल चुनाव के लिए जिस तरह स्टार प्रचारकों की सूची में इकलौते बिहारी चेहरे के तौर पर जगह मिली, उसने साफ कर दिया कि दिल्ली का आलाकमान अब उन्हें भविष्य के मुख्यमंत्री के तौर पर देख रहा है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि नीतीश और बीजेपी के बीच एक ‘म्युचुअल एग्रीमेंट’ बन चुकी है। इस समझौते के तहत मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्राट चौधरी को सौंपी जा सकती है, जबकि जेडीयू अपने आधार को बचाने के लिए निशांत कुमार को सत्ता के केंद्र में रखेगी।
मोदी-शाह से मुलाकात और भविष्य का खाका
नीतीश कुमार की इस दिल्ली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से उनकी मुलाकात संभावित है। माना जा रहा है कि इसी मुलाकात में बिहार की अगली सरकार की ‘फाइनल स्क्रिप्ट’ पर मुहर लगेगी। नीतीश का अगला कदम क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि बीजेपी उनके ‘रिटायरमेंट प्लान’ और निशांत की भूमिका पर कितनी सहमत होती है। चर्चा है कि नीतीश खुद राज्यसभा के जरिए केंद्र की राजनीति में कोई बड़ी भूमिका निभा सकते हैं या फिर मार्गदर्शक की भूमिका में जा सकते हैं।
दांव या समर्पण?
बिहार की जनता और राजनीतिक पंडितों की निगाहें अब पटना से ज्यादा दिल्ली की उन बंद कमरों की बैठकों पर टिकी हैं। क्या नीतीश कुमार वाकई इस्तीफा देकर सबको चौंका देंगे? क्या सम्राट चौधरी बिहार में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रचेंगे? और सबसे बड़ा सवाल, क्या निशांत कुमार राजनीति के इस उबड़-खाबड़ रास्ते पर नीतीश की विरासत को संभाल पाएंगे? 9 अप्रैल की शाम तक इन तमाम सवालों के जवाब मिलने शुरू हो जाएंगे, लेकिन इतना तय है कि बिहार अब एक बड़े सियासी बदलाव की दहलीज पर खड़ा है।
































