मिशन मोड में स्वास्थ्य विभाग : बिहार के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की मनमानी खत्म, ‘अकाउंटेबिलिटी एक्ट’ से कसेगा शिकंजा

बिहार की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को पटरी पर लाने और सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों व स्वास्थ्य कर्मियों की शत-प्रतिशत उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने अब तक का सबसे बड़ा नीतिगत कदम उठाया है। सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस (Private Practice) पर पूरी तरह रोक लगाने की घोषणा के बाद, विभाग ने अब संस्थागत स्तर पर पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने के लिए एक सख्त ‘अकाउंटेबिलिटी (जवाबदेही) नियमावली’ को जमीन पर उतार दिया है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
सरकार का यह नया प्रशासनिक दांव सीधे तौर पर उन डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों पर कड़ा प्रहार है जो ड्यूटी से गायब रहकर गरीब मरीजों को निजी क्लीनिकों के भरोसे छोड़ देते थे।
इस नए नीतिगत दस्तावेज का गहराई से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि सरकार ने अस्पतालों की सूरत बदलने के लिए तीन स्तरों पर घेराबंदी की है :-

  1. डिजिटल हाजिरी और ‘रात्रिकालीन मुस्तैदी’ का सख्त ऑडिट
    सरकारी अस्पतालों की सबसे बड़ी समस्या डॉक्टरों का गायब रहना रही है। विभाग ने इस मर्ज का इलाज डिजिटल तकनीक से निकाला है:

बायोमेट्रिक हाजिरी की कड़ाई: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) से लेकर जिला सदर अस्पतालों तक सभी स्तरों पर बायोमेट्रिक अटेंडेंस को अनिवार्य कर दिया गया है।

सीनियर डॉक्टरों की नाइट ड्यूटी की जांच: अक्सर रात के समय जूनियर डॉक्टरों या इंटर्न्स के भरोसे आपातकालीन वार्ड छोड़ दिए जाते थे। नए नियमों के तहत ‘रात्रिकालीन मुस्तैदी’ को अनिवार्य करते हुए सीनियर डॉक्टरों का ड्यूटी रोस्टर सार्वजनिक किया जाएगा और अनुपस्थित पाए जाने पर सीधे विभागीय कार्रवाई होगी।

  1. ‘रेफरल नेक्सस’ पर रोक: बेवजह मरीजों को टालना पड़ेगा भारी
    अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं होने के बावजूद मामूली दिक्कतों वाले मरीजों को भी उच्च संस्थानों (जैसे PMCH, IGIMS, या DMCH) में ‘रेफर’ करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेने की प्रवृत्ति बहुत पुरानी है।

SOP का कड़ा क्रियान्वयन: स्वास्थ्य विभाग ने इसके लिए एक सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू की है।

अब डॉक्टरों को लिखित में यह प्रमाणित करना होगा कि मरीज को जिला स्तर पर किस तकनीकी या चिकित्सीय कमी के कारण रेफर किया जा रहा है। यदि अस्पताल में दवाएं और जांच उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद मरीज को टाला गया, तो इसे गंभीर कदाचार मानकर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

  1. डिजिटल डैशबोर्ड और आउटसोर्सिंग का सुरक्षा चक्र
    मानव संसाधन और बुनियादी सुविधाओं के प्रबंधन में पारदर्शिता लाने के लिए विभाग ने आधुनिक गवर्नेंस मॉडल का सहारा लिया है:

सेंट्रलाइज्ड डिजिटल मॉनिटरिंग: दवाओं के स्टॉक, आवश्यक उपकरणों की कार्यशीलता और मुफ्त एम्बुलेंस सेवाओं की निगरानी अब एक केंद्रीय डिजिटल डैशबोर्ड के माध्यम से की जाएगी।

आउटसोर्सिंग का सहारा: जनशक्ति और तकनीकी सहायता की त्वरित उपलब्धता के लिए स्वीकृत पदों पर नई नियुक्तियों के साथ-साथ विशेष कार्यों के लिए आउटसोर्सिंग एजेंसियों की सहायता ली जा रही है, ताकि मरीजों को जांच और दवाओं के लिए भटकना न पड़े।

कागजी और प्रशासनिक स्तर पर स्वास्थ्य विभाग का यह ‘मिशन अकाउंटेबिलिटी’ बिहार के आम और वंचित नागरिकों के लिए बेहद राहत देने वाला दिखाई देता है। डॉक्टरों की शत-प्रतिशत उपस्थिति और रेफरल सिस्टम पर नियंत्रण से निश्चित रूप से जिला अस्पतालों पर जनता का खोया हुआ भरोसा वापस लौटेगा। हालांकि, इस व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती निचले स्तर पर जारी नौकरशाही और स्थानीय स्तर के चिकित्सा संघों के संभावित प्रतिरोध से निपटने की होगी। इस नीति की वास्तविक सफलता इस बात पर टिकी है कि स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के इस नियमावली को कितनी कड़ाई से जमीन पर लागू रख पाते हैं।