हाजीपुर में खुलेगा देश का तीसरा ‘निफ्टेम’: जानिए बिहार के आम आदमी, किसानों और युवाओं की कैसे बदलेगी तकदीर

आईआईटी की तर्ज पर बनने वाले इस राष्ट्रीय संस्थान से न केवल फसलों की बर्बादी रुकेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर पैदा होंगे रोजगार के हजारों नए अवसर। यह आर्थिक रूप से समृद्धि के द्वार खोलेगा और बड़े पैमाने पर रोजगार भी सृजित करेगा। युवाओं की सोच और ऊर्जा को एक बेहतर मंच मिल सकेगा।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार के औद्योगिक और शैक्षणिक परिदृश्य में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की हालिया घोषणा के मुताबिक, देश का तीसरा राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता एवं प्रबंधन संस्थान (NIFTEM – निफ्टेम) बिहार के हाजीपुर में 100 एकड़ भूमि पर स्थापित किया जाएगा। कुंडली (हरियाणा) और तंजावुर (तमिलनाडु) के बाद यह देश का महज तीसरा ऐसा संस्थान होगा, जिसे आईआईटी (IIT) और एनआईआईटी (NIT) की तर्ज पर राष्ट्रीय महत्व का दर्जा प्राप्त है। यह फैसला केवल एक संस्थान की स्थापना भर नहीं है, बल्कि यह बिहार के आम आदमी के आर्थिक सशक्तिकरण की बुनियादी शुरुआत है।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि हाजीपुर में निफ्टेम (NIFTEM) की स्थापना महज एक नए कॉलेज का खुलना नहीं है। यह बिहार की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था की नसों में नई ऊर्जा फूंकने का महा-अभियान है। एक आम आदमी के लिए इसका सीधा मतलब है, खेतों में खुशहाली, युवाओं को घर के पास रोजगार, और राज्य के भीतर ही औद्योगिक क्रांति की नई शुरुआत। यदि समय सीमा के भीतर इस परियोजना को धरातल पर उतारा जाता है, तो यह आने वाले दशकों में बिहार के विकास का सबसे मजबूत स्तंभ साबित होगा। बिहार के वैशाली और आसपास के जिलों को देश का ‘फ्रूट बास्केट’ कहा जाता है। हाजीपुर का केला, मुजफ्फरपुर की शाही लीची और इस क्षेत्र में होने वाले आम और सब्जियों का स्वाद दुनिया भर में प्रसिद्ध है। हालांकि, आधुनिक बुनियादी ढांचे और फूड प्रोसेसिंग सुविधाओं के अभाव में हर साल करोड़ों रुपये की फसल खेतों में ही सड़ जाती थी। निफ्टेम की स्थापना सीधे तौर पर इस संकट पर प्रहार करेगी और ‘खेत से थाली तक’ के सफर को मुनाफाखोरों के चंगुल से मुक्त कराकर आम जनता के पक्ष में मोड़ेगी।

किसानों की जेब में जाएगा सीधा पैसा
एक आम किसान के लिए सबसे बड़ी चुनौती फसल काटने के बाद उसे सुरक्षित रखने की होती है। कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स की कमी के कारण किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ती है। निफ्टेम के आने से इस पूरी व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव आएगा। संस्थान के वैज्ञानिक और शोधकर्ता छात्र ‘विलेज एडॉप्शन प्रोग्राम’ (गाँव गोद लेने की नीति) के तहत सीधे गाँवों से जुड़ेंगे। वे किसानों को कटाई के बाद फसल को सुरक्षित रखने (Post-Harvest Technology) की आधुनिक और सस्ती तकनीकें सिखाएंगे।
इसके अलावा, हाजीपुर के केले या मुजफ्फरपुर की लीची को कच्चे माल के रूप में बेचने के बजाय, यदि स्थानीय स्तर पर ही उसके जूस, पल्प, जैम या पैक्ड फूड बनाए जाएं, तो किसानों की आय सीधे तीन से चार गुना बढ़ जाएगी। निफ्टेम इसमें तकनीकी पुल का काम करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि निफ्टेम के आने से उत्तर बिहार में फल और सब्जियों की पोस्ट-हार्वेस्ट बर्बादी में 30 से 40 फीसदी तक की कमी आ सकती है, जो सीधे तौर पर किसानों की शुद्ध बचत होगी।

‘ब्रेन ड्रेन’ पर ब्रेक
इस पहल से युवाओं को घर में ही विश्वस्तरीय शिक्षा मिलेगी और स्टार्टअप का भी मौका मिलेगा। बिहार के हजारों छात्र हर साल फूड टेक्नोलॉजी, बी.टेक (फूड प्रोसेस इंजीनियरिंग) या फूड सेफ्टी जैसे आधुनिक कोर्सेज की पढ़ाई के लिए दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। हाजीपुर में निफ्टेम खुलने से छात्रों का लाखों रुपये का हॉस्टल और यात्रा खर्च बचेगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संस्थान केवल ‘नौकरी पाने वाले’ तैयार नहीं करता, बल्कि ‘नौकरी देने वाले’ यानी उद्यमी बनाता है। कैंपस के भीतर ही अत्याधुनिक इनक्यूबेशन सेंटर, बेकरी प्लांट, डेयरी प्लांट और टेस्टिंग लैब्स होंगी। बिहार का कोई भी आम युवा यहाँ से ट्रेनिंग लेकर खुद का फूड बिजनेस, जैसे- पैक्ड मखाना उद्योग, फल प्रसंस्करण यूनिट या डेयरी ब्रांड शुरू कर सकता है। इसके लिए उन्हें बड़ी पूंजी के बजाय तकनीकी ज्ञान और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने का रास्ता यहीं से मिलेगा।

आम उपभोक्ता और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर
इस परियोजना का आम शहरी और ग्रामीण उपभोक्ताओं पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा। बाजार में मिलने वाले मिलावटी और असुरक्षित खाद्य पदार्थों से आम जनता की सेहत को बड़ा खतरा रहता है। निफ्टेम में फूड सेफ्टी एंड क्वालिटी मैनेजमेंट की राष्ट्रीय स्तर की प्रयोगशालाएं होंगी। इससे स्थानीय स्तर पर बनने वाले खाद्य पदार्थों की कड़े मानकों पर जांच हो सकेगी, जिससे आम उपभोक्ता को शुद्ध, मिलावट रहित और स्वास्थ्यवर्धक पैक्ड फूड किफायती दामों पर उपलब्ध हो सकेगा। स्वास्थ्य पर होने वाले आम जनता के खर्च में इससे बड़ी कमी आएगी।

आर्थिक मोर्चे पर बात करें तो 100 एकड़ में बनने वाले इस विशाल परिसर के कारण हाजीपुर और आसपास के इलाकों का तेजी से शहरीकरण होगा। जब यह संस्थान पूरी तरह काम करना शुरू करेगा, तब बड़े पैमाने पर नॉन-टीचिंग स्टाफ, सुरक्षा गार्ड, प्रशासनिक कर्मचारी, लैब असिस्टेंट और मेंटेनेंस वर्कर्स की जरूरत होगी, जिसमें स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिलना तय है। साथ ही, संस्थान के आसपास लॉज, हॉस्टल, परिवहन (ऑटो, कैब) और कैंटीन सप्लाई का एक नया और बड़ा बाजार तैयार होगा, जिससे छोटे व्यापारियों की आमदनी में भारी इजाफा होगा।